Thursday, 3 March 2016

इशरत जहां मामले में गहन जांच की जरूरत


इशरत जहां मामले में बतौर गृहमंत्री पी चिदंबरम की भूमिका को लेकर संदेह भरे सवाल लगातार सिर उठा रहे हैं। चूंकि ये सवाल बेहद गंभीर हैं और उन्हें एक समय खुद चिदंबरम के सहयोगी रहे अफसर ही उठा रहे हैं इसलिए उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती और इसके बावजूद नहीं की जा सकती कि आखिर इन अफसरों और खासकर तब के गृहसचिव जीके पिल्लई ने समय रहते अपनी आपत्ति क्यों नहीं जताई? चूंकि खुद को प्रताड़ित किए जाने की बात कह रहे गृहमंत्रलय के तत्कालीन अवर सचिव आरवीएस मणि ने पहले भी अपनी शिकायत सार्वजनिक की थी और तब उनकी किसी ने सुनी नहीं इसलिए यह सवाल भी उठता है कि क्या उनकी शिकायत इसीलिए नहीं सुनी गई, क्योंकि संप्रग सरकार मनमानी पर आमादा थी? जो भी हो, गंभीर-अति गंभीर आरोपों से घिरे चिदंबरम की यह सफाई स्वीकार नहीं हो सकती कि उन्होंने इशरत जहां मुठभेड़ के मामले में हलफनामा इसलिए बदला, क्योंकि उन्हें इंटेलिजेंस ब्यूरो की ओर से उपलब्ध कराए गए सुबूत बहुत पुख्ता नहीं जान पड़े। यदि एक क्षण के लिए यह सही भी मान लिया जाए तो भी आखिर हलफनामे को सिरे से बदलने की क्या जरूरत थी और वह भी गृह सचिव को अंधेरे में रखकर? उन्हें यह भी बताना होगा कि क्या गृहमंत्री रहते हुए अपने मंत्रलय की ओर से दायर होने वाले सभी हलफनामे वह खुद लिखाते थे और उनके संदर्भ में गृह सचिव को भी भरोसे में नहीं लेते थे? दरअसल चिदंबरम को ऐसे एक नहीं अनेक सवालों के जवाब देने होंगे, क्योंकि वह इस आरोप से बुरी तरह घिर गए हैं कि उन्होंने अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो का तो दुरुपयोग किया ही, इंटेलिजेंस ब्यूरो के मनोबल को भी तोड़ा और इस तरह आतंकवाद के खिलाफ सक्रिय आंतरिक सुरक्षा के तंत्र को गंभीर क्षति पहुंचाई। 1 यह पहली बार है जब किसी गृहमंत्री पर यह आरोप लग रहा है कि उसने अपने राजनीतिक विरोधियों को फंसाने के लिए आंतरिक सुरक्षा तंत्र से खिलवाड़ किया। यह स्वाभाविक है कि वह भाजपा के निशाने पर हैं, लेकिन आवश्यक केवल यह नहीं है कि इस मसले पर संसद में बहस हो, बल्कि यह भी है कि उन आरोपों की गहन जांच के आदेश दिए जाएं जिनसे पी चिदंबरम दो-चार हैं। यह जांच उच्चस्तरीय होनी चाहिए और साथ ही यथाशीघ्र होनी चाहिए। यह संभव है कि चिदंबरम की भूमिका का खुलासा होने के बाद भी इशरत जहां और तीन अन्य के साथ हुई मुठभेड़ संदिग्ध पाई जाए और इस मामले में चल रहे मुकदमे पर कोई खास असर न पड़े, लेकिन इस सवाल का जवाब सामने आना ही चाहिए कि क्या तत्कालीन गृहमंत्री के रूप में चिदंबरम ने इस सच को छिपाने के लिए छल किया कि इशरत जहां आतंकी संगठन लश्कर की सदस्य थी? क्या इससे सनसनीखेज और कुछ हो सकता है कि एक आतंकी को आम नागरिक साबित करने के लिए तथ्यों से छेड़छाड़ की जाए और वह भी खुद गृहमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति की ओर से? इस विचलित करने वाले सवाल का जवाब सामने आए, यह केंद्र सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए। केंद्र सरकार को यह अहसास होना चाहिए कि जितना जरूरी चिदंबरम के बेटे के संदिग्ध कारोबार की जांच कराना है उससे कहीं ज्यादा जरूरी इशरत मामले में खुद उनकी भूमिका की जांच कराना भी है।