Monday, 15 February 2016

देश में JNU को लेकर हो रही शर्मनाक राजनीति


जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों का बचाव करने की जैसी होड़ राजनीतिक दलों में मची है वह शर्मनाक भी है और चिंताजनक भी। यह होड़ सिर्फ इसलिए मची है, क्योंकि इस विश्वविद्यालय के जिन अतिवादी छात्रों ने संसद पर हमले में शामिल रहे आतंकी अफजल गुरु को शहीद बताने के साथ देश विरोधी नारे लगाए उनका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों ने प्रबल विरोध किया। चूंकि विद्यार्थी परिषद के विरोध के बहाने मोदी सरकार को निशाने पर लेने की सुविधा थी इसलिए विरोधी राजनीतिक दल मामले की गंभीरता को सोचे-समङो बगैर हायतौबा मचाने लगे। एक ओर वे यह कह रहे हैं कि देश विरोधी नारे पूरी तरह अस्वीकार्य हैं और दूसरी ओर ऐसे नारे लगाने वाले छात्रों के पक्ष में भी खड़े हैं। वे यह ज्ञान देने की भी कोशिश कर रहे हैं कि सरकार को असहमति का सम्मान करना चाहिए। यह ज्ञान देने वालों में वामपंथी दल तो हैं ही, कांग्रेस भी है। वामपंथी दलों के संदर्भ में यह किसी से छिपा नहीं कि उनके समर्थकों ने पश्चिम बंगाल और केरल में अपने राजनीतिक विरोधियों की सुनियोजित हत्या करने में संकोच नहीं किया। इसी तरह कांग्रेस के नीति-नियंताओं से भी यह पूछा जाना चाहिए कि अगर पार्टी के अनुशासन के नाम पर वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है तो राष्ट्र के अनुशासन से खिलवाड़ की अनदेखी क्यों की जानी चाहिए? वैसे भी यह वही कांग्रेस है जिसने छोटे-छोटे मसलों पर विभिन्न लोगों पर देशद्रोह के मामले दर्ज कराए। कांग्रेस को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उसकी सरकार ने ही यह सुनिश्चित किया था कि अफजल गुरु को फांसी मिले। यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक भी था, लेकिन आज वही कांग्रेस संकीर्ण राजनीतिक कारणों से अफजल गुरु के अधूरे अरमानों को पूरा करने का नारा लगाने वाले छात्रों का बचाव करना जरूरी समझ रही है। 1 कांग्रेस एक ओर वामपंथी दलों की रीति-नीति और उनकी विचारधारा को गई गुजरी बता रही है और दूसरी ओर खुद को वामपंथी दलों से भी चार कदम आगे दिखाने को उतावली है। अच्छा हो कि कांग्रेस के नीति-नियंता यह सोचें कि वे किधर जा रहे हैं? जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट तौर पर कह दिया कि निदरेष छात्रों के खिलाफ कहीं कोई कार्रवाई नहीं होगी तो फिर इतनी चीख-पुकार मचाने की क्या आवश्यकता है? जेएनयू में जैसे देश विरोधी नारे लगे वैसे ही आए दिन कश्मीर में और पाकिस्तान में लगते रहते हैं। यदि कांग्रेस एवं अन्य विरोधी राजनीतिक दलों को यह लगता है कि जेएनयू के उग्र वामपंथी छात्र संगठनों ने देश विरोधी नारे लगाकर कुछ गलत नहीं किया तो क्या यह मान लिया जाए कि उन्हें अब हाफिज सईद की रैलियों में लगने वाले नारों से भी कहीं कोई आपत्ति नहीं। यह ठीक है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे की होड़ में अक्सर बचकाना व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे अपनी लक्ष्मण रेखा ही भूल जाएं। यदि जेएनयू में देश विरोधी नारे लगना सामान्य बात है तो फिर इसका मतलब है कि कल को देश भर के स्कूलों-कालेजों में ऐसा होने लगे तो इन राजनीतिक दलों को कहीं कोई आपत्ति होने वाली नहीं है। यह बेहद लज्जाजनक है कि ये दल मोदी सरकार के अंधविरोध में यह भी देखने के लिए तैयार नहीं कि वे कैसे तत्वों की पक्षधरता कर रहे हैं और इससे देश-दुनिया को कितना नुकसान हो रहा है।