Wednesday, 3 February 2016

आरक्षण के नाम पर वोट बैंक की राजनीति



भारत में आरक्षण के नाम पर चल रहे खतरनाक खेल के बारे में बात करेगें हमारे संविधान निर्माता इस सोच के साथ आरक्षण का फॉर्मूला लेकर आए थे कि इससे देश का वंचित और पिछड़ा समुदाय दूसरे वर्गों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकेगा लेकिन संविधान लागू होने के 66 वर्ष बाद हालत ये हो गई है कि हमारे देश में हर किसी को आरक्षण चाहिए। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि आरक्षण की मांग करने वाले ये आंदोलन हिंसक होने से भी नहीं हिचक रहे हैं यानी आरक्षण की मांग को लेकर गाड़ियां फूंक दी जाती हैं, ट्रेनें रोक दी जाती हैं, ट्रेनों में आग लगा दी जाती है, सड़कें जाम कर दी जाती हैं और एक तरह से पूरे सिस्टम को ठप कर दिया जाता है। ऐसे आंदोलनों में कई बार निर्दोष लोगों की जान भी चली जाती है।
आंध्र प्रदेश में आरक्षण के नाम पर इसी तरह से उबल रहा है। जहां कापू समुदाय के लोग ख़ुद को आरक्षण के ओबीसी कोटे में शामिल करने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। वहा आंदोलनकारियों ने दो पुलिस थानों में आग लगा दी। एक ट्रेन की बोगियों में आग लगा दी और रेलवे ट्रैक और नेशनल हाईवे को जाम कर दिया यानी एक तरह से आंध्र प्रदेश के एक इलाके को बंधक बना लिया गया।

आंदोलनकारियों ने तो कोई हिंसा नहीं की लेकिन राज्य सरकार को अल्टीमेटम दिया है। इस पर राज्य सरकार का कहना है कि उन्हें थोड़ा वक्त चाहिए। कुल मिलाकर ये वही स्क्रिप्ट है जो पिछले कुछ वर्षों में देश के तमाम दूसरे राज्यों में भी देखी गई हैं। गुजरात में पटेल समुदाय को आरक्षण चाहिए, राजस्थान में गुजर्रों को आरक्षण चाहिए, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाटों को आरक्षण चाहिए और ना जाने कितने समुदाय, कितनी जातियां आरक्षण पाने के लिए लाइन में खड़ी है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि वोटबैंक के लालच में हमारे नेता आरक्षण की इस आग में घी डालने का काम करते हैं और इस बात की भी कोई चिंता नहीं करते कि आरक्षण की इस आग से देश लगातार झुलस रहा है। सवाल ये है कि आरक्षण के नाम पर ये ख़तरनाक खेल कब तक चलता रहेगा?

आंध्र प्रदेश के कापू समुदाय के बारे में भी जानना ज़रूरी है

-आंध्र प्रदेश में कापू समुदाय की आबादी करीब 27 फीसदी है।
-तेलगू भाषा में कापू का अर्थ होता है किसान।
-कापू समुदाय काफी हद तक समृद्ध माना जाता है, जैसा कि गुजरात में पटेल हैं।
-इस समुदाय के लोग किसान भी हैं और व्यवसायी भी हैं।
-काफी संख्या में कापू समुदाय के लोग विदेश में रहते हैं और वहां पढ़ने भी जाते हैं।
-हालांकि कापू समुदाय का कहना है कि वो सरकारी नौकरियों और शिक्षा में पिछड़े हैं।
-ओबीसी कोटे में कापू समुदाय को लाने की मांग पहली बार वर्ष 1994 में उठी थी।
-कापू समुदाय की आरक्षण की मांग को राजनैतिक दलों ने वोटबैंक के हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल किया।

इसकी वजह से कभी कापू समुदाय कांग्रेस के साथ, तो कभी तेलगूदेशम पार्टी के साथ राजनैतिक रूप से जुड़ता रहा है। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव से पहले सत्ताधारी तेलगूदेशम पार्टी के नेता एन चंद्रबाबू नायडू ने कापू समुदाय से आरक्षण वादा किया था। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अभी हाल में कापू समुदाय की मांग पर अध्ययन करने के लिए जस्टिस मंजूनाथ कमीशन बनाया था। हालांकि दिक्कत ये है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जातिगत आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय है और कापू समुदाय को आरक्षण देने से इसका उल्लंघन होगा।

दलितों के मसीहा कहे जाने वाले संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का मानना था कि ये अनुचित है कि बहुसंख्यक जाति, अल्पसंख्यक समूह के अस्तित्व से इंकार करे, लेकिन ये भी उतना ही अनुचित है कि अल्पसंख्यक हमेशा अल्पसंख्यक ही बने रहना चाहे। डॉक्टर अंबेडकर इस बात के सख्त खिलाफ थे कि समाज का कोई भी अल्पसंख्यक तबका हमेशा के लिए अल्पसंख्यक ही बना रहे। इसीलिए डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान सभा में ये प्रस्ताव रखा था कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में सिर्फ तीस या चालीस वर्ष तक ही आरक्षण दिया जाए इसके साथ ये प्रावधान भी हो कि इस अवधि को किसी भी सूरत में बढ़ाया नहीं जाए।

डॉक्टर अंबेडकर का विचार था कि अपना विकास करने के बाद उस विशेष समुदाय को बाकी समाज में घुलमिल जाना चाहिए और अपना विशेष दर्जा छोड़ देना चाहिए। हालांकि संविधान सभा ने उनकी बात ना मानकर आरक्षण के लिए केवल दस वर्ष की अवधि तय की और इसके साथ ही ये प्रावधान भी जोड़ दिया कि जरूरत समझे जाने पर इस अवधि को बढ़ाया जा सकता है और इसका नतीजा आप सभी जानते हैं। आज संविधान लागू होने के 66 वर्ष के बाद भी आरक्षण व्यवस्था लागू है। डॉक्टर अंबेडकर जाति पर आधारित आरक्षण को जाति व्यवस्था खत्म करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे, उसे मजबूत करने के लिए नहीं। लेकिन स्वतंत्रता के बाद का इतिहास बताता है कि पिछले 66 वर्षों में जाति व्यवस्था टूटने के बजाय और ज्यादा मज़बूत ही हुई है। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का नाम लेकर आरक्षण की राजनीति करने वाले लोग देश को अंधेरे में रख रहे हैं क्योंकि वो डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की बातों का पूरी तरह पालन नहीं करते।

जिस आरक्षण व्यवस्था की शुरुआत पिछड़े समाज की तरक्की की भावना से की गई थी..उसे अब अधिकार समझा जाने लगा है...देश में आरक्षण के असर को महसूस करने के लिए आपको पता होना चाहिए कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थाओं में अनुसूचित जातियों को 15 फीसदी अनुसूचित जनजातियों को साढ़े 7 फीसदी और अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी को 27 फीसदी के आरक्षण की सुविधा प्राप्त है।

यहां आपको बता दें कि जिस ओबीसी परिवार की सालाना आय 6 लाख रुपये या उससे ज्यादा होती है उन्हें  आरक्षण व्यवस्था का कोई लाभ नहीं मिलता और उन्हें क्रीमी लेयर माना जाता है। कुल मिलाकर देश की शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में 49.5 फीसदी आरक्षण है। अब आपको ये भी समझना चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था का कितना असर हुआ है नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट एंड शेड्यूल्ड ट्राइब्स के मुताबिक

-वर्ष 1959 में केंद्र सरकार की नौकरियों में क्लास वन अधिकारियों में सिर्फ 1.18 फीसदी पिछड़ी जातियों से थे।
-वर्ष 1984 में ये आंकड़ा बढ़कर करीब सात फीसदी हो गया।
-वर्ष 1995 आते-आते केंद्र सरकार की नौकरियों में 10 फीसदी से ज्यादा क्लास वन अधिकारी पिछड़ी जातियों के हो गये।
-वर्ष 2011 में ये संख्या और ज्यादा बढ़कर 12.27 फीसदी हो गई।
-यानी एससी-एसटी वर्ग को आरक्षण का फायदा मिला है।
-हालांकि प्रदर्शन की बात की जाए तो नतीजों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं।
-वर्ष 2014 में आईआईटी बॉम्बे के छात्रों पर हुई स्टडी के मुताबिक.
-एवरेज कम्यूलेटिव परफार्मेंश इंडेक्स में सामान्य वर्ग के छात्रों को औसतन 8.09 का स्कोर मिला।
-ओबीसी छात्रों को 6.6 का स्कोर मिला।
-जबकि एससी-एसटी छात्रों को 5.9 का स्कोर मिला।

ज़रूरी नहीं है कि ऐसा हर बार होता हो और हर जगह होता हो। ये स्कोर अलग-अलग केसेज में मौजूदा स्तर से अलग भी हो सकता है।  दूसरा उदाहरण है वर्ल्ड डेवलपमेंट जर्नल स्टडी, जिसकी रिपोर्ट 2015 में आई थी। इसमें पब्लिक सेक्टर में प्रोडक्टिविटी पर रिजर्वेशन के असर को समझने की कोशिश की गई थी और इस स्टडी में पाया गया कि आरक्षण से उत्पादकता पर कोई बुरा असर देखने को नहीं मिलता। ये स्टडी दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के दो प्रोफेसर्स ने भारतीय रेलवे पर 1980 से 2002 के बीच की थी। यानी कुछ स्टडीज अच्छे परफार्मेंश की बात करती हैं और कुछ बुरे प्रदर्शन की बात कहती हैं। इस पर और रिसर्च किए जाने की ज़रूरत है।

एक बात साफ है कि जाति और धर्म के बजाए आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। सवाल ये है कि उच्च वर्ग के गरीब व्यक्ति को आरक्षण की ज्यादा ज़रूरत है या आर्थिक रूप से संपन्न पिछड़ी जातियों को? क्या किसी गरीब को इसलिए सामाजिक समानता का अधिकार देने से इंकार किया जा सकता है कि वो सामान्य श्रेणी से ताल्लुक रखता है। इसलिए जानकार मानते हैं कि आरक्षण अगर देना है तो आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो को देना चाहिए। आरक्षण का दुरुपयोग देश के खिलाफ जाएगा।

हमें लगता है कि आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगो के लिए होनी चाहिए..क्योंकि गरीब...गरीब ही होते हैं..और गरीबी की कोई जाति नहीं होती। हमारे देश की समस्या ये है कि हम हर स्थिति और घटना को धर्म और जाति के चश्में से देखते हैं। हैदराबाद में एक छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या को दलित छात्र की आत्महत्या कहकर प्रचारित किया गया था। ये अपने आप में बहुत चुभने वाली बात है क्योंकि अगर कोई घटना दलित छात्र के साथ होती है तो उसे अलग तरह से देखा जाता है और सामान्य वर्ग के छात्र के साथ हुई घटना को अलग तरह से देखा जाता है। यानी आत्महत्या जैसी दुखद घटना का भी जाति के आधार पर बंटवारा कर दिया गया है।

इस विश्लेषण के अंत में हम इस बात पर ज़ोर देना चाहते हैं कि जिस तरह दुनिया की सुपरपावर बनने के लिए कोई आरक्षण नहीं होता.. उसी तरह कोई देश या समाज, सिर्फ आरक्षण के आधार पर आगे नहीं बढ़ सकता।