Thursday, 25 February 2016

पी चिदंबरम का बयान गैर जिम्मेदाराना राजनीति की पराकाष्ठा



कांग्रेस के नेता और पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम का यह बयान गैर जिम्मेदाराना राजनीति की पराकाष्ठा है कि शायद अफजल गुरु के बारे में सही ढंग से फैसला नहीं लिया गया और उसे बिना पैरोल के उम्र कैद की सजा दी जा सकती थी। संसद पर हमले के दोषी अफजल की फांसी के तीन साल बाद इस तरह का बयान इसलिए और शरारतपूर्ण है, क्योंकि अगस्त 2011 में जिस समय गृहमंत्रलय ने तत्कालीन राष्ट्रपति को यह सलाह दी थी कि अफजल की क्षमादान की अर्जी ठुकरा दी जाए उस समय केंद्रीय गृहमंत्री की कुर्सी पर खुद चिदंबरम ही आसीन थे। आखिर उस समय वह मौन क्यों रहे? सवाल यह भी है कि उन्हें अफजल के फैसले की याद उसकी फांसी के तीन साल बाद क्यों आई? क्या इसलिए, क्योंकि इस समय जेएनयू में अफजल के महिमा मंडन का मसला गर्म है और कांग्रेस को इस बात का जवाब देते नहीं बन रहा है कि राहुल गांधी संदिग्ध आचरण वाले छात्रों के साथ क्यों खड़े हुए? चिदंबरम किस तरह जहर घोलने वाली क्षुद्र राजनीति कर रहे हैं, यह इससे भी साबित होता कि एक ओर उन्हें संसद पर हमले के मामले में अफजल की भूमिका पर संदेह भी है और दूसरी ओर वह उसे बिना पैरोल वाली उम्रकैद की सजा को उपयुक्त भी बता रहे हैं। इसका मतलब तो यही है कि उन्हें जिस बात पर संदेह है उस पर ही भरोसा नहीं है। 1 चिदंबरम महज कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व गृहमंत्री और वित्तमंत्री भर ही नहीं है, बल्कि बड़े वकील भी हैं। उन्हें यह अच्छी तरह पता होना चाहिए कि कानूनी फैसले संदेह नहीं, बल्कि सुबूतों की बुनियाद पर होते हैं। चिदंबरम एक नाजुक मसले पर किंतु-परंतु और शायद के सहारे बयान देकर उन तत्वों के हाथों में खेलने का काम कर रहे हैं जो यह दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं कि अफजल के साथ न्याय नहीं किया गया। आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में यह पहली बार नहीं है जब चिदंबरम संकीर्ण राजनीति को प्राथमिकता देते नजर आ रहे हों। सभी जानते हैं कि इशरत जहां मुठभेड़ के मामले में किस तरह अदालत में दिए गए उस हलफनामे को बदला गया जिसमें यह स्वीकार किया गया था कि इशरत जहां लश्कर की सदस्य थी। उस समय गृहमंत्री चिदंबरम ही थे। चिदंबरम के इस खतरनाक खेल की पोल डेविड हेडली के साथ-साथ उनके समय के गृह सचिव जीके पिल्लई ने भी खोली है। क्या चिदंबरम और उनके साथी जीके पिल्लई के इस दावे को झुठलाने का साहस कर सकते हैं कि इशरत जहां मामले में दूसरे हलफनामे में बदलाव राजनीतिक दबाव के बाद ही किया गया और उसमें यह जानकारी हटाई गई कि इशरत के साथ मारे गए आतंकी लश्कर के थे। इशरत जहां मुठभेड़ के मामले में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्रलय की कारस्तानी की पोल खुलने के बाद यह और स्पष्ट हो जाता है कि चिदंबरम राजनीतिक लाभ के फेर में देश की सुरक्षा और साथ ही प्रतिष्ठा को दांव पर लगाने का काम कर रहे हैं। चिदंबरम राजनीति के गिरते स्तर की जैसी बानगी पेश कर रहे हैं उसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है।