Monday, 15 February 2016

बेरूखी



शहरी विकास मंत्रलय की ओर से साफ-सफाई के मामले में 73 शहरों की जो सूची जारी की गई वह एक बार फिर यही बताती है कि दक्षिण एवं पश्चिम के राज्यों के मुकाबले उत्तर और पूर्व के राज्यों के शहर साफ-सफाई को लेकर कम सतर्क और सक्रिय हैं। इस सूची के प्रथम दस शहरों में यदि चंडीगढ़ और दिल्ली के एनडीएमसी इलाके को छोड़ दिया जाए तो उत्तर भारत के राज्यों का कोई शहर नजर नहीं आता। चंडीगढ़ एवं एनडीएमसी के मामले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इन दोनों शहरों का प्रशासन केंद्र सरकार के हाथों में है। अक्टूबर 2014 में स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने के पहले साफ-सफाई के स्तर को लेकर पिछले वर्ष 476 शहरों की जो सूची सामने आई थी उससे यह उम्मीद बंधी थी कि ये सभी स्वच्छता अभियान के प्रति कहीं अधिक गंभीरता का परिचय देंगे। यह आश्चर्यजनक है कि पश्चिम भारत के कुछ शहरों ने तो यह उम्मीद पूरी की और इसी का परिणाम है कि सूरत, राजकोट और ग्रेटर मुंबई शीर्ष दस शहरों की सूची में स्थान बनाने में सफल रहे, लेकिन ऐसा लगता है कि उत्तर भारत के राज्यों ने कहीं से कोई प्रेरणा लेने की जरूरत नहीं समझी। 73 शहरों की इस सूची में जिस तरह वाराणसी फिसड्डी साबित हुआ उससे यह स्पष्ट है कि शहरों को साफ-सुथरा बनाने के मामले में जो कुछ भी करना है वह स्थानीय निकायों, स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकारों को ही करना है। केंद्र सरकार राज्यों को कुछ संसाधन ही मुहैया करा सकती है। 1 चूंकि शीर्ष दस शहरों में उत्तर भारत का कोई शहर स्थान नहीं बना सका इसलिए इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा अन्य कोई जरिया नहीं कि इस क्षेत्र के शहर साफ-सफाई के प्रति पर्याप्त गंभीरता का परिचय नहीं दे रहे हैं। गंभीरता के इस अभाव के लिए नौकरशाही ही अधिक जिम्मेदार है और इन राज्यों में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल भी। यदि राज्य सरकारें अपनी नौकरशाही को इसके लिए प्रेरित नहीं करेंगी कि वे शहरों को साफ-सुथरा बनाने के लिए सक्रिय हों तो फिर आगे भी ऐसे ही नतीजे सामने आने वाले हैं। यह निराशाजनक है कि साफ-सफाई के मामले में उत्तर भारत के शहर एक ऐसे समय निराशाजनक प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं जब वे पहले के मुकाबले कहीं अधिक संसाधनों से लैस हैं। यह सही है कि स्थानीय निकायों को अभी भी और संसाधनों की दरकार है, लेकिन पहली जरूरत तो साफ-सफाई को लेकर राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर प्रदर्शित की जाने वाली इच्छाशक्ति की है। यदि इच्छाशक्ति का यह अभाव बना रहा तो स्थानीय निकायों को कैसे भी संसाधन मुहैया करा दिए जाएं, स्थिति में कोई तब्दीली आने वाली नहीं है। यह समझना कठिन है कि स्थानीय निकायों के अफसर और नेता समस्याओं के निदान के उपाय खोजने के नाम पर इधर-उधर के दौरे करने के बावजूद मैसूर और तिरुचिरपल्ली जैसे शहरों के स्थानीय निकायों से कोई सबक सीखने से क्यों इन्कार कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि शहरों की गंदगी के लिए प्रमुख रूप से स्थानीय निकाय ही उत्तरदायी हैं, लेकिन किसी न किसी स्तर पर शहरों के वाशिंदों की भी जिम्मेदारी बनती है। यह पहले दिन से कहा-बताया जा रहा है कि स्वच्छता अभियान तभी सफल होगा जब आम नागरिक भी साफ-सफाई के मामले में अपनी जिम्मेदारी का परिचय देंगे, लेकिन ऐसा लगता है कि अभी इस संदेश को सही तरीके से ग्रहण नहीं किया जा सका है।