Sunday, 21 February 2016

हकीकत जीबी रोड की



                             
अगर आपसे कोई पूछे कि दिल्ली में गारस्टिन बास्टिन रोड कहां है तो शायद ही आप कुछ बता पाएं लेकिन अगर इसी रोड के बारे में यही सवाल इसका संक्षिप्त नाम यानी जीबी रोड लेकर पूछा जाए तो हो सकता है कि आप पूछने वाले को एक हिकारत भरी नजर से देखें या फिर मुंह बिदका लें या ये भी हो सकता है कि ये सवाल सुनकर जवाब देने की बजाय आपके चेहरे पर अजीब सी शरारतपूर्ण मुस्कान नजर आने लगे।
जी हां, दिल्ली के सबसे बड़े रेडलाइट एरिया जीबी रोड की यही बदकिस्मती है। ऐसी बदकिस्मती जिसने जीबी रोड को दिल्ली-एनसीआर ही नहीं तकरीबन पूरे उत्तर भारत में जिस्मफरोशी के बदनाम अड्डे की पहचान दिलाई है। इस पहचान के आगे यहां काम कर रही सैकड़ों-हजारों महिलाओं की बेबसी, दर्द, मजबूरी और हालात के सवाल फीके लगते हैं और हमेशा अनसुने रह जाते हैं। खुद इन महिलाओं ने भी इस हकीकत के साथ जीना सीख लिया है, तभी तो जब कोई उनसे पूछता है कि इस धंधे में क्यों आईं, तो उनका जवाब होता है टाइम क्यों खोटी कर रहे हो साहब?’
 साहब! हर कोई यही क्यों पूछता है कि तुम इस धंधे में क्यों आईं?’ जी हां, दिल्ली के सबसे बड़े रेडलाइट एरिया जीबी रोड की यही बदकिस्मती है। ऐसी बदकिस्मती जिसने जीबी रोड को दिल्ली-एनसीआर ही नहीं तकरीबन पूरे उत्तर भारत में जिस्मफरोशी के बदनाम अड्डे की पहचान दिलाई है।
जीबी रोड को इसकी बदनामी से निजात दिलाने की एक अटपटी सी कोशिश 1965 में हुई थी, जब इसका नाम बदलकर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग कर दिया गया लेकिन इसका परिणाम वही हुआ जो इस तरह की कोशिशों का अक्सर होता आया है, ये नाम सरकारी फाइलों और दस्तावेजों के अलावा कहीं नजर नहीं आता। बदलाव के नाम पर दशकों में अगर यहां कोई परिवर्तन आया है तो वो ये कि एक समय उत्तर भारत में इस धंधे का केंद्र रहा ये इलाका, आज जगह-जगह खुल चुके मसाज पार्लर, एस्कॉर्ट और डेटिंग सेवाओं के दौर में महज निचले तबके के पुरुषों की सेक्स कुंठाएं दूर करने के काम आता है।
एक अनुमान के मुताबिक जीबी रोड पर जिस्मफरोशी के सहारे जीवन गुजार रही महिलाओं की संख्या 4 से 5 हजार तक है। इनमें से अधिकतर पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार और यूपी से यहां लाई गई हैं। भारत के बाद सबसे ज्यादा नेपाल की महिलाएं यहां सक्रिय हैं। जीबी रोड से गुजरने वाले ग्राहकों के लिए सड़क के दोनों ओर इमारतों की खिड़कियों से झांकती सजी-धजी लड़कियां शोकेस में रखे माल की तरह हैं तो नीचे घूमते उनके दलाल चलते-फिरते रेट कार्ड की तरह जिन्हें हर लड़की की उम्र, रंग, शारीरिक बनावट से लेकर घंटे के हिसाब से कीमत तक रटी हुई है।
जब हमने यहां देह व्यापार में लिप्त कुछ महिलाओं से बात की। एक महिला जोसेफ (परिवर्तित नाम) कहती हैं कि मैं 2003 में यहां आई थी और पिछले 11 साल में अगर कुछ बदला है तो उम्र के साथ आए ग्राहकों की संख्या में आई कमी। जोसेफ ठीक तरह से हिंदी नहीं बोल पाती लेकिन उनका कहना है कि इस बात से भी बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, यहां संवाद के लिए किसी भाषा की जरूरत नहीं है। जोसेफ कहती हैं कि पेड सेक्स के लिए इच्छा जाहिर करना या उसके लिए पैसे देने या लेने के काम में कुछ बुरा नहीं है क्योंकि इस दौरान कोई जबरदस्ती, हिंसा या डराने-धमकाने का मामला नहीं बनता है। वो कहती हैं कि अब मुझे इस जिंदगी की आदत हो चली है और उसके अधिकतर ग्राहक वफादार भी हैं। इस सवाल के जबाव में कि क्या उसे अजनबियों से डील करना अजीब नहीं लगता? वह कहती हैं कि देखिए हम लोग एक स्थापित नेटवर्क के जरिये काम करते हैं जो बिना किसी रुकावट के धंधे में मददगार है।
ऐसी ही एक अन्य महिला रिया (परिवर्तित नाम) यहां 7 साल से हैं और अब किसी बदलाव का इंतजार नहीं कर रही हैं। उनके लिए पिछले 7 साल में यहां कुछ नहीं बदला है। इस सवाल पर कि वो इस धंधे में क्यों आई? रिया चिढ़ते हुई कहती हैं कि जो भी यहां पहली बार आता है वो अपना 5 मिनट इसी फालतू सवाल पर खराब करता है जिसका कोई जवाब मेरे पास नहीं होता है। रिया कहती हैं कि यहां फेक सहानुभूति वाले लोग बहुत आते हैं जो क्रांतिकारी बदलाव की बात तो करते हैं लेकिन उनका मकसद भी एक ही होता है।
बंगाल से आईं काजल कहती हैं कि वो पिछले 3 साल में कई एनजीओ से मिल चुकी हैं लेकिन कुछ खास बदलाव नहीं देख पाईं। अधिकतर एनजीओ यहां सिर्फ केस स्टडी के लिए आते हैं जिनका उनके हित से कोई सरोकार नहीं होता। काजल कहती हैं कि यहां बदलाव की बात कभी नहीं होती, यहां सुविधाओं की बात कभी नहीं होती। यहां बात होती है सिर्फ पुनर्वास की, जो हमें नहीं चाहिए। काजल कहती हैं कि दिल्ली में सरकार बदली तो बस बयान बदले मगर यहां सुविधाएं नहीं दी गईं। वैसे भी यहां से बाहर निकलने के बाद मुश्किलें कम नहीं होतीं बल्कि बढ़ ही जाती हैं। बाहर हमें घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। बेहतर यह है कि हमें यहीं अच्छा माहौल प्रदान किया जाए।
जीबी रोड की इन महिलाओं के बयानों में नजर आने वाली संतुष्टि असली है या ये उनके हालात के सामने हार मानकर उसके साथ कर लिए गए समझौते का ऐलान है, इसे आसानी से समझा जा सकता है। वैसे भी शाम को सजने वाले इस बाजार में भारी मेकअप, सस्ते परफ्यूम, शराब की दुर्गंध, गुटखे-तंबाकू की पीक से सनी दीवारों और हलके म्यूजिक के बीच असलियत नजर आए भी तो कैसे। अंदर तो अंदर जीबी रोड पर बाहर खड़ी भीड़ जिस भूखी नजरों से खिड़की पर टकटकी लगाए रहती है, उसे देखकर पहली नजर में ही समझा जा सकता है कि यहां न रिश्तों की कोई जगह है और न मानवीय संवेदनाओं की। यहां ऊपर खिड़की में खड़ी महिला गर्म गोश्त भर है और नीचे खड़ा ग्राहक उसका खरीदार। वहां पर पिछले 15 साल से पान की दुकान करने वाले राय बहादुर बताते हैं कि दैनिक मजदूरी करने वाले कुछ लोगों पर नशा इस कदर हावी है कि वो पैसे के अभाव में कभी कभी पूरे दिन खिड़की के सामने टकटकी लगाए रहते हैं।

कई महिलाएं अपने हालात से समझौता कर इसे ही अपना नसीब स्वीकार कर चुकी हैं। लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने इन हालात को बदलने की ठानी और किसी न किसी तरह कोठे की चारदीवारी से छुटकारा पाकर समाज की मुख्यधारा में लौटी। कुछ महिलाओं से बात की। रेडलाइट एरिया GB रोड से तो निकल आई जूली और लीना लेकिन... लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने इन हालात को बदलने की ठानी और किसी न किसी तरह कोठे की चारदीवारी से छुटकारा पाकर समाज की मुख्यधारा में लौटी।

जीबी रोड से एक गैर-सरकारी संगठन की मदद से छुड़ाई गईं लीना (परिवर्तित नाम) कहती हैं कि वह इस भरोसे वहां से निकलकर बाहर आईं कि बाकी की जिंदगी सम्मान और गरिमा के साथ जी सकें। अब उनकी जिंदगी पहले से काफी अच्छी है। उन्होंने अपनी आजीविका के लिए सिलाई मशीन का काम सीख लिया है और दिल्ली की ही एक कॉलोनी में अपनी दुकान चलाती हैं। वहां से निकलने के बाद उन्हें अपनी पहचान सबसे छुपानी पड़ी। छोटे बच्चों के साथ समाज की मुख्यधारा में जीना आसान नहीं था। लेकिन समय के साथ अब धीरेधीरे सब ठीक हो रहा है।
सात साल तक इस धंधे में रहने के बाद समाज की मुख्यधारा में लौटीं जूली उन दिनों को याद कर अब भी सिहर जाती हैं। हालांकि बड़ी-बड़ी उम्मीदों और सपने लेकर इस धंधे से बाहर निकल कोलकाता पहुंचीं जूली को यह समाज उन्हीं भूखे भेड़ियों की तरह नजर आता है जो पहले जीबी रोड पर नजर आता था। जूली कहती हैं कि वह कोलकाता के एक कमरे में अकेले रहती हैं और इस बात के लिए रोज उनको लोगों के सवालों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपने कल का भी कुछ पता नहीं है कि क्या होगा। परिवार के सवाल पर जूली भावुक हो जाती हैं और इस सवाल पर कुछ भी कहने से इनकार करती हैं।
जूली के इस इनकार के पीछे के दर्द और टीस को साफ महसूस किया जा सकता है। जूली अपनी आजीविका के लिए कुछ घरों में काम करती हैं और भविष्य की चिंता किए बगैर आज में जी रही हैं। लीना और जूली की कहानी बताती है कि जीबी रोड की काली कोठरियों से यहां फंसी बदकिस्मत लड़कियों को निकालना भर काफी नहीं है। अगर उनके पुनर्वास की उचित व्यवस्था नहीं होगी तो उनके लिए बाहर की जिंदगी भी एक भंवर के निकलकर दूसरे भंवर में फंसने जैसी होगी।
वही वर्तमान में भारत में देह व्यवसाय में संलग्न कुल लोगों की कुल संख्या 25 लाख के करीब है। इस बात का कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है कि इनमें से कितनों ने स्वेच्छा से इस व्यवसाय को चुना और कितनों को मजबूरन इसमें धकेला गया। हालांकि जानकारों की मानें तो इस व्यवसाय में बीते कुछ सालों में अपेक्षाकृत गरीब पृष्ठभूमि और सस्ते श्रमिक व्यवसायों से आने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। संयुक्त राष्ट्र ने अप्रैल महीने में भारत में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर तैयार रिपोर्ट में भी यौन व्यापार में संलग्न महिलाओं की स्थिति को बेहद खराब बताया था। मानव तस्करी को रोकने के मामले में भारत संयुक्त राष्ट्र के दूसरी श्रेणी में है। दुनिया भर में 100 अरब डॉलर से अधिक के इस धंधे की कानूनी मान्यता अलग-अलग देशों में अलग-अलग है।
जानकारों की मानें तो इस व्यवसाय में बीते कुछ सालों में अल्पसंख्यक और अपेक्षाकृत गरीब पृष्ठभूमि और सस्ते श्रमिक व्यवसायों से आने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। जहां तक भारत की बात है तो ह्यूमन वॉच रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 20 लाख से अधिक महिलाएं देह व्यापार से किसी न किसी रूप से जुड़ीं हैं जिनमें 20 फीसदी से अधिक की उम्र 18 साल से कम है।
महिला और बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे भारत में करीब 1100 रेड लाइट क्षेत्रों में 3 लाख कोठों पर करीब 20 लाख से अधिक महिलाएं इस क्षेत्र से जुड़ी है जिनमें से90 फीसदी भारतीय और करीब 10 फीसदी विदेशी महिलाएं शामिल हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से बड़ी संख्या एचआईवी से संक्रमित हैं। मुंबई में 2 लाख से अधिक महिलाएं इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और हर साल इस क्षेत्र में 40 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है। दिल्ली पुलिस के अनुमान के मुताबिक राजधानी में देह व्यापार का सालाना टर्न ओवर 600 करोड़ रुपये के आसपास है।
नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन (नाको) की महानिदेशक रहीं के. सुजाता राव कहती हैं कि सरकारी सख्ती इस पेशे को रोक नहीं पाएगी और ये जहां गुपचुप तरीके से और ते़जी से होने लगेगा, वहीं एड्स संक्रमण रोक पाना भी सरकार के बूते से बाहर हो जाएगा। राय के अनुसार स्वीडन का उदाहरण प्रमाण है कि वहां रोक के बावजूद यह व्यवसाय रुका नहीं और जिन वेश्याओं को रोकने का प्रयास किया गया, वे नार्वे में जाकर पेशा करने लगीं। चूंकि पेड सेक्स की हमेशा मांग रहेगी, इसलिए सप्लाई का जरिया भी निकाल ही लिया जाएगा।
सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली कमेटी की एचआईवी पर स्टडी ग्रुप की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि एशिया में एड्स का वायरस पुरुषों द्वारा सेक्स हेतु पैसा देने की प्रवृत्ति के चलते बड़ी ते़जी से फैल रहा है। आज हालत ये है कि साढ़े सात करोड़ के करीब पुरुष वेश्याओं से शारीरिक संबंध बनाते हैं और एक करोड़ से ज्यादा महिलाएं इस धंधे में शामिल हैं। एनजीओ शक्तिवाहिनी के संचालक ऋषिराज कहते हैं कि सेक्स के जरिए फैलने वाली बीमारियों को देखते हुए साफ-सफाई और बेहतर मेडिकल इलाज और सुविधाओं की जरूरत है।
जीबी रोड पर देह व्यापार, मानव तस्करी के अलावा भी क्राइम कम नहीं हैं। यहां स्थित एक निजी बैंक के कर्मचारी कहते हैं कि महिलाओं की इस कहानी के अलावा यहां पुरुष भी कम प्रताड़ित नहीं होते है। वहां पहली बार पहुंचने वाले ग्राहक कई बार लूट-पाट के शिकार होते हैं और वे इसकी शिकायत भी नहीं कर सकते हैं। कहा जाता है कि यहां भी ठगी से बचने के लिए किसी पहुंच का इस्तेमाल करना पड़ता है। सेंट्रल दिल्ली के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त चिन्मय बिस्वाल कहते हैं कि पुलिस हमेशा मदद के लिए तैयार है और कोई सूचना मिलते ही कार्रवाई की जाती है। हालांकि एनजीओ शक्तिवाहिनी के संचालक ऋषिराज कहते हैं कि अगर वेश्याओं को गिरफ्तारी या हिंसा का डर रहेगा तो वे कैसे अपने साथ हुए किसी अपराध की रिपोर्ट पुलिस से कर सकेंगी?  दिल्ली पुलिस के ही एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यहां अधिकतर ग्राहक नशे की हालत में होते हैं और यही कारण है कि अपराधियों का काम आसान हो जाता है। इस तरह के अपराध को अंजाम नीचे सड़कों पर न देकर उपर कमरे में ही दिया जाता है। गैरकानूनी होने के कारण कोई भी पक्ष शिकायत करने के लिए तैयार नहीं होता जिस कारण छोटे मोटे अपराधों पर कारवाई काफी मुश्किल हो जाती है।