Monday, 15 February 2016

जेएनयू में राजनीतिक सियासत



एक बार फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) राष्ट्र विरोधी गतिविधयों के  आरोप के कारण सुर्खियों में है। इस बार जेएनयू में हमेशा से सक्रिय वाम दल गंभीर सवालों के घेरे में है और लंबे समय से जेएनयू में पैठ बनाने की कोशिश में लगी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) भी मौके की नजाकत को समझते हुए अपनी राजनीति का दांव खेल चुका है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा खुलासा गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह कह कर किया है कि इन छात्रों को लश्कर-ऐ- तैयबा के आतंकी हाफिज सईद का समर्थन प्राप्त है। अगर यह बयान किसी राजनीतिक हित साधने के लिए नहीं दिया गया है और इसके पीछे किसी जांच एजेंसी का कोई इनपुट है तो निश्चित रूप से यह बेहद चौंकाने वाला मामला है।

कन्हैया से पुलिस कस्टडी के दौरान हर पहलू से यह जांच करने की कोशिश होगी कि कहीं कन्हैया कुमार और उसके साथियों के तार किसी आतंकी संगठन से तो नहीं जुड़े हुए हैं। पुलिस ने इस मामले में 6 और  लोगों को आरोपी बनाया है। छात्रों में उमर खालिद, आशुतोष कुमार, अर्निबन भट्टाचार्य, राम नागा, अनंत प्रकाश के नाम शामिल हैं। इनमें से अधिकतर छात्र फिलहाल अभी पकड़ से बाहर हैं। निश्चित तौर पर जिन छात्रों ने देश का नागरिक होते हुए अपने ही देश की खिलाफ इन शब्दों का प्रयोग किया है तो उनके खिलाफ कठोर से कठोर कदम उठाना चाहिए। देखते ही देखते यह पूरा मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया और इसके बाद शुरू हुआ राजनीति का खेल। सोशल मीडिया ने पूरे जेएनयू को आतंकियों के गढ़ के रूप में बदल दिया गया। बुद्धजीवियों का गढ़ माना जाने वाला यह कैंपस पूरे राष्ट्र की नजर में आतंकी ठिकाना की तरह लगने लगा।
कई जानकारों का कहना है कि पहले से चल रहे यूजीसी विवाद और रोहित वेमुला के आंदोलन को कमजोर करने के लिए भी कन्हैया को आनन फानन में गिरफ्तार कर लिया गया। अगर कन्हैया की गिरफ्तारी के पीछे बीजेपी और एबीवीपी की कोई भूमिका है तो यह कदम बीजेपी के लिए आत्मघाती हो सकता है।

यह पूरा मामला 9 फरवरी के शाम की है और इसी तारीख को संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के तीन वर्ष पूरे हुए थे। लेफ्ट विचारधारा के छात्रों के समूह ने इस अवसर पर साबरमती हॉस्टल के सामने शाम के 5 बजे संसद अटैक के दोषी अफजल गुरु और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के को-फाउंडर मकबूल भट की याद में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। "द कंट्री ऑफ अ विदाउट पोस्ट ऑफिस" नामक इस कार्यक्रम में वामंपंथी विचारधारा के छात्र सम्मिलित थे और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष , उपाध्यक्ष और अन्य लोग उपास्थिति थे, जिनका उद्देश्य भारत की न्यायिक व्यवस्था पर चर्चा करना था।

इस कार्यक्रम को प्रशासन द्वारा पहले इजाजत मिल गई थी लेकिन एबीवीपी की शिकायत के बाद जेएनयू प्रशासन ने अनुमति वापस ले ली। उस समय इस आयोजन में शामिल होने के लिए कन्हैया कुमार करीब 100 छात्रों को लेकर आयोजन स्थल तक पहुंच चुके थे। छात्र संघ के ज्वाइंट सेक्रेटरी और एबीवीपी सदस्य सौरभ कुमार शर्मा भी उसी समय करीब 50 छात्रों के साथ आयोजन स्थल की तरफ बढ़ रहे थे जिसमें कुछ छात्राएं भी शामिल थी।

अनुमति रद्द होते ही छात्र ज्यादा उग्र हो गए, बावजूद इसके वाम संगठनों ने इस कार्यक्रम को जारी रखने का फैसला किया लेकिन एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया। बढ़ते तनाव के बीच कुछ छात्रों ने राष्ट्रविरोधी नारे भी लगाए। हालांकि कन्हैया ने साफ कहा है कि उन्होने देश विरोधी नारे नहीं लगाए। प्रत्यक्षदर्शियों की अगर मानें तो साफ है कि वहां खड़ी भीड़ से कुछ विवादित नारे सुनने को जरूर मिले। यह पूरा मामला अभी जांच का विषय है और रिपोर्ट आने के बाद ही पूरा मामला साफ हो पाएगा।

यह कार्यक्रम उस समय विवाद का कारण बन गया जब कैंपस के अंदर 'भारत की बर्बादी' 'तुम कितने अफजल मारोगे घर-घर से अफजल निकलेगा' और 'पाकिस्तान जिंदाबाद' जैसे नारे लगने लगे। मुद्दों पर बहस होने के बजाए अब बहस मुद्दों को निशाना बनाने के लिए हो रही है।

 इस पूरे बहस में दो अलग अलग पहलू है । एक है कुछ छात्रों द्वारा देश विरोधी नारे लगाना तो दूसरा है कन्हैया की गिरफ्तारी। जाहिर है देश का कोई नागरिक देश विरोधी गतिविधियों का समर्थन नहीं कर सकता, कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, और इस बात को न मानना भारत के संविधान का विरोध करना है। लेकिन जहां तक कन्हैया की गिरफ्तारी का सवाल है तो जाहिर है बिना किसी सबूत के अगर छात्रनेता कि गिरफ्तारी हुई है तो इस पर सवाल जरूर उठेंगे। लेकिन जिस तरह इस पूरे मुद्दे को सियासी रंग देने के साथ-साथ पूरी लड़ाई को राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही बनाया जा रहा है तो वह बेहद खतरनाक है।

दिल्ली के वसंत कुंज थाने की पुलिस ने जेएनयू छात्र संघ के नेता कन्‍हैया कुमार को गुरुवार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया है। पुलिस ने कन्हैया के खिलाफ देशद्रोह की धारा आईपीसी 124ए और आपराधिक साज़िश रचने की धारा 120 बी के तहत मामला दर्ज किया है। देशद्रोह का यह कानून 1860 में बनाया गया था और 1870 में इसे आईपीसी में शामिल कर दिया गया। गौरतलब है कि 124ए के तहत लिखित या मौखिक शब्दों, चिन्हों, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर नफरत फैलाने या असंतोष जाहिर करने पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया जाता है। आपको बता दें कि 124ए के तहत केस दर्ज होने पर दोषी को उम्रकैद की सजा होती है। इस पूरा मामले में बिहार के केदारनाथ सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 1962 में केदारनाथ सिंह पर राज्‍य सरकार द्वारा लगाए गए देशद्रोह के मामले पर कोर्ट ने रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की एक कॉन्स्टीट्यूशन बेंच की ओर से दिए गए आदेश में कहा गया कि देशद्रोही भाषणों और अभिव्‍यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े। कौन कौन हो चुके हैं इस कानून के शिकार ? कन्‍हैया कुमार के अलावा अभी हाल ही में गुजरात में पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग करते हुए हिंसक आंदोलन शुरू करने वाले हार्दिक पटेल को भी अक्‍टूबर 2015 में गुजरात पुलिस की ओर से देशद्रोह के मामले के तहत गिरफ्तार किया गया था। हालांकि देशद्रोह के केस में गिरफ्तार होने वाले लोंगों की पेहरिस्त लंबी है। सितंबर 2012 में काटूर्निस्‍ट असीम त्रिवेदी को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय साइट पर संविधान से जुडे तस्‍वीरें पोस्‍ट करने की वजह से, 24 दिसंबर 2010 को बिनायक सेन को नक्‍सल विचारधारा को फैलाने के आरोप में और 2010 में अरुंधति रॉय को कश्‍मीर-माओवादियों पर एक बयान देने की वजह से देशद्रोह के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।

इस मुद्दे पर जेएनयू में प्रोफेसर रहे और विख्यात विचारक पुष्पेश पंत ने कहा  है कि लोकतंत्र में हर किसी को बोलने की स्वतंत्रता होनी चाहिए लेकिन पिछले कुछ दिनों में जेएनयू में कुछ संगठनों ने लक्ष्मण रेखा पार की है। पंत ने कहा कि कुछ तत्व इस कैंपस का माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं और उन पर कार्रवाई कना जरूरी है। पंत ने आपातकाल जैसी किसी हालात को एक सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यहां भी कानूनों का पालन पूरी सख्ती से होना चाहिए और अभिव्यक्ति की आजादी का नाजायज फायदा उचाने पर रोक लगनी चाहिए।


कन्हैया कुमार दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के छात्र संघ के अध्‍यक्ष हैं। कन्हैया के पिता किसान हैं और ऐसा कहा जा रहा है कि वर्तमान में वह पैरालाइसिस से पीड़ित हैं। कन्हैया की मां आंगनबाड़ी वर्कर के रूप में 4 हजार रुपए हर महीने कमाती हैं। मगध यूनिवर्सिटी से स्नातक कन्हैया के परिवार वालों का कहना है कि  बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कन्हैया ने लेफ्ट उम्मीदवार के लिए प्रचार किया था और इसलिए कन्हैया के खिलाफ साजिश रची गई। कन्हैया हाई स्कूल से ही सीपीआई की स्टूडेंट विंग ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़े रहे हैं।



आखिर इसका समाधान क्या है? फेसबुक-ट्विटर सहित अन्य सोशल मीडिया के जरिए पर शट डाउन जेएनयू और आई लव माई इंडिया जैसे हैशटैग के साथ सिर्फ भावनाएं भड़काने से क्या देश में राष्ट्रभक्ति का संचार हो जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि 8000 विद्यार्थियों की क्षमता वाले जेएनयू में केवल 5-7 छात्रों के इस गतिवीधि से क्या पूरा परिसर जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा घोषित किया जाना जायज है? और अगर ऐसा है तो कई बार बीजेपी की सहयोगी संगठन भी गांधी को राष्ट्र विरोधी और गोडसे को देशभक्त बताता रहा है, ऐसे में क्या उन संगठनों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।