Thursday, 1 October 2015

वो आखिर सफर और हमारी यादे

अजीब दिन थे । बाहों में बाहें डाले चहलकदमी करते रहने के दिन । उतरते हुए सूरज और ढलती हुई शामों के दिन । दूजे के हाथों प्रेम संदेशा पहुँचाने के दिन । गली के नुक्कड़ पर उसका इतंजार करते रहने के दिन । किताबों के आखिरी सफहों पर मन में पिघल रहे कुछ शब्दों को लिख देने के दिन ।

ऐसे ही उन दिनों में कस्बाई सपने, जो सुबह सूरज के साथ उगते थे और ढलती हुई शामों के साथ छतों से कपड़ों की तरह उतार लिये जाते थे । कई आँखें थी आस पास जो मिल जाने पर शरमा कर झुक जाया करती थीं। कई आँखों में दबे-छुपे से प्रणय निवेदन तो कई आँखें जो भुलायी नहीं जा सकती । शराफत के दिन, नजाकत के दिन, मोहब्बत के दिन, आरजुओं के दिन ।

वो उसे बस यूँ ही एक रोज़ अपनी छुट्टियों के होने पर वापसी में घर जाते हुए उसी स्टेशन पर मिल गयी । तब ना यूँ किसी को 'फ्लर्ट' करने के तरीके आते थे और ना ही कोई किसी को 'इम्प्रेस' करने की कोशिश किया करता था । बहुत सादगी हुआ करती थी । एक दूजे के आमने सामने बैठे हुए भी कई घंटे बिना बात किये हुए बीत जाते थे और जो नज़रें मिल जाएँ तो अन्दर ही अन्दर अजीब सी हलचल सी मच जाया करती थी ।

कनिका, हाँ यही तो नाम बताया था उसने जब वो विनय को दूसरी बार फिर यूँ ही उसी रास्ते घर को जाने के लिये स्टेशन पर मिली थी । फिर हर बार ही उनमें कुछ ऐसी अनकही बातें सी हो गयीं थीं कि छुट्टियां होने पर वो स्टेशन पर एक दूजे का इंतज़ार किया करते और जब तक दूसरा ना आ जाता तब तक पहला ना जाता । बड़े सुहाने दिन थे, तब शायद वो रेलगाड़ियाँ भी दोस्त हुआ करती थीं । जो दोनों के साथ हो जाने तक वहीँ खड़ी रहती थीं।


कनिका  को विनय  दो स्टेशन पहले ही उतरना होता था । तब आज की तरह उन कस्बाई रूहों में बाय बाय या टाटा-टाटा कहने का रिवाज नहीं हुआ करता था । बस विनय उसका सामान उसे उसके रेलगाड़ी से नीचे उतर जाने पर पकड़ा दिया करता था और कनिका "अच्छा" कहती हुई चली जाया करती थी ।

जब साथ हुआ करते तो उन्हें सब पता रहता था कि अब कौन सा स्टेशन आएगा या किस स्टेशन पर कौन सी खाने की चीज़ अच्छी मिलती है । दूसरे के बोलने से पहले ही कोई बोल पड़ता कि चलो ये खायें या फिर कभी कभी दोनों एक साथ ही बोल पड़ते, ये भी एक अजीब बात थी कि दोनों की जुबान से एक से ही लफ्ज़ निकलते थे
साथ वापस आते और फिर साथ ही दोबारा कॉलेज जाते हुए उस दूर बसे दूसरे शहर के लिये दिल में कुछ पैदा हो गया था । शायद ऐसा कुछ कि क्या ये नहीं हो सकता कि ये जिंदगी ऐसे ही सफ़र करते हुए कट जाए । कहने को तो ना ही कनिका ने कुछ कहा था और ना ही विनय ने कभी कुछ पूंछना चाहा ।

उन्हीं दिनों में जब "आई लव यू" कहने का रिवाज़ ना था । ना ही कोई अपने प्रेम का इजहार यूँ खुले रूप में करता था । मौन स्वीकृतियां ही प्रेम कहानी बन जाया करती थी । तब तो बस वही भोले भाले से प्रेम पत्र हुआ करते थे जो कि चाहने वालों के दिलों से निकली हुई आवाजें दूजे के दिल तक पहुँचाया करते थे ।

वो चेहरे के भाव, वो आँखें, वो ख़ामोशी और फिर रह रहकर कुछ बात कर लेने की आदत । सब कुछ तो याद हो गया था विनय को । एक दूजे की कई आदतें पता चल चुकी थीं, उन किये हुए सफर के दौरान । दोनों ओर से मौन रहते हुए भी, कुछ भी ऐसा नहीं था कि जो कहने को बाकी था ।

तब उस रोज़ वो अकेली नहीं थी । एक बुजुर्ग चेहरा भी उस चेहरे के साथ था । साफ़ था, कि वो जाहिरी तौर पर उसके पिताजी ही थे । उस रोज़ रेलगाड़ी भी वही थी और सफ़र करने वाले भी वही, मगर आँखों में ख़ुशी नहीं थी । सवाल तो कभी उन आँखों ने पूंछे ही न थे । तब उस रोज़ की ख़ामोशी ने सब कुछ पहले ही बयाँ कर दिया था । ऐसी गहरी ख़ामोशी तो कभी न रही थी उस चेहरे पर जो कि सीधे दिल में उतर जाए और छा जाए एक खामोश पल बनकर ।

जब रेलगाड़ी से उतरते हुए उसने वो किताब उस बुजुर्ग चेहरे के सामने ही विनय को वापस की थी । तो बहुत कुछ तो बिना जाने ही उस दिल को आभास हो चला था ।

किताब का आखिरी सफ़हा जो कि अब कनिका की जुबाँ थी और जो कह रही थी । अब अगले बरस मैं नहीं आ सकूँगी, आगे की पढाई शायद अब मैं ना कर सकूँ । पिताजी अब यही चाहते हैं ।

उस आखिरी सफ़हे का साफ़ कहना था कि अब कनिका फिर इस सफ़र पर नहीं आएगी और आगे की पढाई ना करने का मतलब था कि उसके पिताजी ने उसका रिश्ता कहीं तय कर दिया है । उस रोज़ वो कनिका का आखिरी सफ़र था जिसमें कब कौन सा स्टेशन गुज़र गया, ना ही तो कनिका ने जानना चाहा था और ना ही विनय ने ।

ट्रेन से उतर जब वो उस पुल पर पहुँची थी तब उसने पलट कर एक बार देखा था और जाते हुए अपना रुमाल गिराया था । विनय तब चाहते हुए भी वहाँ पहुँच वो रुमाल नहीं उठा सका था । रेलगाड़ी में उसका सामान रखा हुआ था । किताबें, पेन, कपड़े और वो आखिरी किताब भी जिसके आखिरी सफ़हे पर कनिका के लिखे हुए आखिरी लफ्ज़ थे । रेलगाड़ी चल दी थी और तब विनय के पास इतना वक़्त ना था कि वो दौड़कर जाकर उस रुमाल को उठा ले । उसकी आखिरी निशानी भी तो ना ले सका था विनय।

इतने बरस बीत गये । पता नहीं कहाँ होगी कनिका । उस आखिरी रोज़ के आखिरी सफ़र में वो निशानी भी जाती रही ।