Thursday, 23 July 2015

संकट में भारत की संसदीय व्यवस्था





संसद जनतंत्र का मंदिर है, दलतंत्र का युद्ध क्षेत्र नहीं। संसद भारत की अभिलाषा, स्वप्न और समृद्धि पर संवाद का शीर्ष जनप्रतिनिधि मंच है। संसद राष्ट्रजीवन की जिजीविषा है। राष्ट्र प्रतिबद्ध वाद विवाद ही इस संस्था की जीवन ऊर्जा हैं, लेकिन संसदीय प्रणाली संकट में है। कांग्रेस सहित अधिकांश विपक्षी दल संसद को राजनीतिक झगड़ों का मंच बना रहे हैं। संसदीय गतिरोध बढ़ा है। संसदीय कलह की अंतरराष्ट्रीय चर्चा है। अमेरिका सहित अन्य कई देशों के समाचार माध्यमों में भी इस गतिरोध पर व्यापक टिप्पणियां हैं। यों संसद और विधानमंडलों में हल्ला-गुल्ला कोई नई बात नहीं। विधायी सदनों का कामकाज काफी लंबे समय से घटा है। हल्ला और शोर-शराबा बढ़ा है। बहस की गुणवत्ता लगातार घटी है, पर मानसून सत्र में एक नई परंपरा भी जुड़ी है। सामान्यतया विपक्ष चर्चा की मांग पर बल देता है। सत्तापक्ष कतराता है, लेकिन चालू सत्र में सरकार बहस को तैयार है, पर विपक्ष मुद्दा आधारित चर्चा से भाग रहा है।


लोकसभाध्यक्ष ने पोस्टर और नारेबाजी को अनुचित बताया था। कांग्रेस ने तीसरे दिन भी नारेबाजी सहित काली पट्टी का प्रदर्शन किया। चुनावी हार की खुन्नस है। संसदीय गतिरोध से राष्ट्रजीवन में निराशा है।1भारत की संसदीय व्यवस्था ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था की उधारी है। गांधीजी ने ‘हिन्दू स्वराज’ (1909) में ब्रिटिश संसद की कटु आलोचना की थी, ‘सांसद ऊंघते हैं, शोर मचाते हैं। इस संसद ने कोई अच्छा काम नहीं किया।’ ब्रिटिश संसद सभाकक्ष में सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच बिछे कालीन में विभाजक लाल रेखा है। दो बेंचों के मध्य दो तलवारों की लंबाई की दूरी है। संसदीय परिपाटी के प्रारंभ में सांसदों को हथियार ले जाने की अनुमति थी। संसदीय परंपरा की कथित जननी ब्रिटिश संसद में भी झगड़े थे। प्राचीन रोम के शासक जूलियस सीजर की हत्या विधायी सदन में ही हुई थी। दक्षिण कोरिया, नाइजीरिया, पेरू, यूक्रेन आदि के विधायी सदनों में भी कलह होती है, लेकिन प्राचीन भारत की सभा समितियां प्रीतिपूर्ण संवाद का मंच थीं। ऋग्वेद में सूक्त है कि शासक सभा में वैसे ही जाता है जैसे कलश में सोमरस गिरता है। सभा में जाने वाले ही सभ्य/सभेय कहे गए। बौद्ध काल के गणतंत्रों में भी सभा सदनों की कार्यवाही उत्कृष्ट थी। शुरुआती दौर की भारतीय संसद भी विचार-विमर्श का केंद्र थी, लेकिन भारतीय राजनीति ने परंपरा और संस्कृति से प्रेरणा नहीं ली। सो संसद और विधानमंडल ‘दल कलह’ के मंच बनाए जा रहे हैं।1भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है। यहां हरेक स्तर पर निर्वाचित संस्थाएं हैं- ग्रामसभा, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, विधानमंडल और फिर सर्वोच्च संसद। सारी संस्थाएं संसदीय कार्यवाही की ओर टकटकी लगाती हैं। आमजन समाचार माध्यमों से चिपके रहते हैं-हमारे लिए क्या हुआ? आर्थिक सुधारों के लिए अगले कदम के इंतजार में। जीएसटी जैसे सर्वहितैषी कानून अथवा भूमि अधिग्रहण जैसे विधेयकों पर संभावित बहस की अधीर प्रतीक्षा में और श्रमिक वर्ग श्रम कानूनों की प्रतीक्षा में। लेकिन विपक्ष बहस से भाग रहा है। नीति आयोग की बैठक में नीतीश कुमार के अलावा विपक्षी दल का कोई मुख्यमंत्री नहीं आया। वे आते, बहस करते, अपना पक्ष रखते। उभयपक्षी तर्क और तथ्यों से जनता का ज्ञानवर्धन कर सकते थे। ललित मोदी मामले में सरकारी पक्ष ने बहस की तत्परता दिखाई। सुषमा स्वराज बयान देने को तैयार थीं। मध्य प्रदेश का घोटाला राज्य स्तरीय विषय है। अरुण जेटली ने नियमों के हवाले व्यवस्था का प्रश्न उठाया। केंद्र सरकार राज्यों के मामले में शासन का अधिकार नहीं रखती। केंद्र की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार संसद को आवंटित विधायी विषयों तक सीमित है। अनु. 246 की 7वीं अनुसूची में संसद व राज्य विधानमंडलों को आवंटित विषय हैं। जेटली के तर्क संवैधानिक थे, लेकिन विपक्ष तैयार नहीं हुआ। 1दलतंत्र जनता के समक्ष जवाबदेह है। परस्पर आरोप-प्रत्यारोप जवाबदेही नहीं होते। विधायी सदनों में शोर-शराबे के लिए दलतंत्र ही जिम्मेदार है। दलतंत्र को बताना चाहिए कि संसद सहित महाराष्ट्र, केरल, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु आदि विधानसभाओं में अप्रिय संघर्ष क्यों हैं? सदन कलह मंच क्यों बन रहे हैं? विधायी सदनों में आमजनों की समस्याओं पर व्यापक चर्चा क्यों नहीं होती? उत्तर प्रदेश में लंबे समय से सत्ररंभ के दिन हुल्लड़ की ही गारंटी क्यों है? संसद और विधानमंडल स्वयं अपनी ही बनाई नियमावली से ही क्यों नहीं चलते? अंग्रेजीराज में गठित केंद्रीय विधानसभा के समय (1921) अध्यक्ष फ्रेडरिक व्हाइट की अध्यक्षता में पीठासीन अधिकारियों का पहला सम्मेलन शिमला में हुआ था। तबसे हर बरस पीठासीन अधिकारियों के अखिल भारतीय सम्मेलन होते हैं। लोकसभा के महत्वपूर्ण प्रकाशन ‘संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ के अनुसार सम्मेलन का उद्देश्य संसदीय प्रणाली का समुचित विकास और उसी दिशा में उचित परंपरा का विकास करना है। विधायी सदनों के अध्यक्षों/सभापतियों व अन्य महानुभावों के कई सम्मेलनों में संसदीय कामकाज को ठीक से चलाने के तमाम प्रस्ताव पारित हुए। उन प्रस्तावों को कार्य व आचरण में क्यों नहीं लाया गया?1संसद त्यागपत्र मांगने का उपयुक्त स्थल नहीं है। मुद्दा आधारित वाद-विवाद ही संसद की प्रतिष्ठा है। लेकिन संसदीय कार्यवाही में दलीय संघर्ष हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय प्रश्नों पर बहस नहीं चाहती। उसने त्यागपत्रों और शोर शराबे को ही संसदीय कर्तव्य बनाया है। संकीर्ण राजनीतिक लड़ाई ने संसद का एजेंडा उलट दिया है। राबर्ट वाड्रा के विरुद्ध संसदीय विशेषाधिकार हनन के नोटिस पर कांग्रेस खफा है। विशेषाधिकार हनन का नोटिस संसदीय कार्यवाही का अतिमहत्वपूर्ण भाग है। उसे टाला नहीं जाता। संसद और विधानमंडलों ने हुल्लड़ व विषयांतर रोकने के अनेक संकल्प लिए। लोकसभा के स्वर्ण जयंती अधिवेशन (1997) में सर्वसम्मत प्रस्ताव हुआ था, ‘सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी संपूर्ण नियमों तथा व्यवस्थित कार्य संचालन संबंधी पीठासीन अधिकारियों के निर्देशों के सचेतन तथा गरिमापूर्ण अनुपालन द्वारा संसद की प्रतिष्ठा का परिरक्षण और संवर्धन किया जाए।’ लेकिन संकल्प और व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर है। संकल्प में विधिवत कार्य संचालन का आदर्श है, व्यवहार में विधिवत् गतिरोध पर ही सर्वसम्मति है। 1सत्तापक्ष सदनों के प्रति जवाबदेह है। सरकार को जवाबदेह बनाना विपक्ष का प्रमुख कर्तव्य है। विपक्ष को भी जवाबदेह होना चाहिए। जनादेश प्राप्त सरकार को काम करने से रोकना और सदन न चलने देना किसी भी सूरत में औचित्यपूर्ण नहीं है। भारत विश्व प्रतिष्ठ हो रहा है। संसदीय सदनों की कार्यवाही को भी उसी स्तर पर लाना होगा। अनुशासनहीन सदन अनुशासित शासन तंत्र नहीं दे सकते। संसदीय गरिमा और अनुशासन का प्रभाव राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रों पर पड़ता है। दल अपनी कलह के लिए अन्य मंच खोजें। चुनाव सुधारों के माध्यम से दलतंत्र के भीतर जनतंत्र की प्रतिष्ठा करनी होगी। विधायी सदनों को दलीय राजनीति की झगड़ालू परिधि से बाहर करने का नियम बनाना होगा। संसदीय अनुशासन को सदस्य चुने जाने की अर्हता से जोड़ना चाहिए और संसदीय अनुशासनहीनता को सदस्यता की निर्हता से। विधायी कार्य राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की साधना हैं, सामान्य राजनीतिक व्यवसाय या बयानबाजी नहीं। समूची संसदीय व्यवस्था के अस्तित्व पर संकट है। आत्मरूपांतरण के अलावा और कोई मार्ग नहीं।