Thursday, 28 May 2015

मोदी सरकार का एक साल कितना पास कितना फेल

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश-विदेश के अपने हर भाषण में एक बात ज़रूर कह रहे हैं कि पिछले बारह महीनों में भारत ने अपना ‘खोया हुआ’ स्वाभिमान वापस पाया है। भारत की सकारात्मक छवि पूरे विश्व में फिर से स्थापित हुई है। क्या ऐसा सच में हुआ है? ऐसा क्या हुआ है इन 12 महीनों में कि नरेन्द्र मोदी ने कहा कि पहले लोग भारत में जन्म लेने के कारण शर्मिंदा महसूस करते थे और अब अपने भारतीय होने पर गर्व महसूस करने लगे हैं? वैसे यह कहना तो अतिशयोक्ति होगी की इन चंद महीनों में स्थिति ‘शर्म’ से ‘गर्व’ तक पहुच गयी है पर निश्चित रूप से भारत की छवि बेहतर तो हुई है। पर बदलाव जितना ज़मीनी स्तर पर दिखना चाहिए था उससे कहीं ज्यादा अभी सिर्फ़ मनोवैज्ञानिक है। 



मनमोहन सिंह की युपीए 2 के अंतिम महीनों तक अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं थी और सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी हुई थी। दुनिया भर में यह माना जा रहा था कि भारत की बढ़ती ताकत स्थिर होती जा रही है। पर जब से नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वे इस नकारात्मक छवि को तोड़ने में लगे हैं। मोदी सरकार ने पूरी चमक-दमक के साथ ऐसी योजनाओं की शुरुआत की जिनसे दुनिया भर यह माहौल बने कि भारत में सर्वंगीण विकास हो रहा है। निसंदेह स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, बेटी बचाओ और जनधन जैसी योजनायें काफ़ी प्रभावशाली दिखती हैं। इसके अलावे कोयला और टेलिकॉम की नीलामी के तरीके को बेहतर करने की कोशिश की गयी। अर्थव्यवस्था में सुधार के प्रति अपनी गंभीरता दिखाने के लिए सरकार ने अध्यादेश का रास्ता अपनाया और विपक्ष की काफ़ी आलोचना भी झेली। राज्यों के विकास के लिए अधिक फण्ड की व्यवस्था की गयी। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रायों से भी देश को फ़ायदा होगा। उम्मीद है जापान और चीन से भारत में निवेश आने की अच्छी सम्भावना बनी है। मगर फिर भी यह स्वीकार करना होगा की साल भर में कोई बहुत बड़ा निवेश देश में नहीं हुआ है। नरेन्द्र मोदी ने अपनी विदेश यात्रायों से ना सिर्फ़ भारत के साथ अन्य देशों के सम्बन्ध मजबूत करने की कोशिश की बल्कि आगे से नेतृत्व करते हुए भारत की छवि चमकाने का भी पूरा प्रयास किया। लगभग सभी देशों में एनआरआई जनता को संबोधित करके यही करने की कोशिश की जा रही थी।

इन सब के बावजूद, मोदी सरकार के पहले साल के ख़त्म होते-होते सरकार के कामकाज के ढंग को देखते हुए ऐसे भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सरकार अपने ताम-झाम वाली योजनायों को सफलतापूर्वक अंजाम तक पंहुचा पायेगी! फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता की सरकार इस सन्दर्भ में दूरदर्शिता दिखाते हुए किसी दीर्घकालिक योजना पर काम कर रही हो। सरकार के पास कोई असरदार रोडमैप नहीं दिखता। निवेश के रूप में अगर काफ़ी सारे छोटे-छोटे प्रोजेक्ट शुरू भी होते हैं तो अर्थव्यवस्था को तो दूरगामी लाभ नहीं होने जा रहा। सरकार अपनी प्राथमिकताओं को ले कर भी हमेशा भ्रम में दिखती है। जैसे कि भूमि अधिग्रहण बिल को पास करने में अपनी सारी ताक़त झोकने से बेहतर यह होता की सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए प्रतिबद्धता दिखाती और किसानों का विश्वास जीतती। अगर आर्थिक सुधार की नज़र से देखें तो अर्थव्यवस्था को गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स बिल की ज़रूरत भूमि अधिग्रहण बिल से अधिक है। 

अब आगे के लिए सरकार को शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने, अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेने, अधिक से अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने और किसानों के हित में अविलम्ब काम करने की ज़रुरत है। साथ ही राज्यसभा में बहुमत के आभाव से जूझती सरकार को अधिक से अधिक विपक्ष को साथ ले कर चलना भी सीखना होगा। विकास और स्वाभिमान का मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिक दिनों तक नहीं चलने वाला यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जितना जल्दी को समझ लेना पड़ेगा। अच्छे दिनों का तिलिस्म टूटते देर नहीं लगेगी।