Thursday, 16 April 2015

नेहरु गांधी परिवार का एकलौते राजनीतिक वारिश भारत लौटा

कांग्रेस महासचिव अपने अज्ञातवास से लौटे चुके हैं। 56 दिन बाद उनकी स्वदेश वापसी हुई है। राहुल का गायब होना भारतीय राजनीति के लिए यक्ष प्रश्न था। भारतीय मीडिया उनकी राजनीतिक कुशलता और नेतृत्व क्षमताओं पर तीखा प्रहार किया। राजनीतिक विश्लेषक और प्रतिपक्ष ने उन्हें रणछोड़ जैसे शाब्दिक सम्मानों से सम्मानित किया। उनकी वापसी को लेकर कांग्रेस में कोई खास हचलच नहीं दिखी। लेकिन मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका उनके वापसी के पहले उनके आवास पर पहुंची। राहुल गांधी के अज्ञातवास के बाद अब उनकी वापसी भी उतनी अहम हो गयी है। कांग्रेस और देश उनकी ओर देख रहा है। वापसी में राहुल गांधी क्या लाए हैं। वह कौन सी जड़ी-बूटी है जो दमतोड़ती कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित होगी।
अभी तक यह सवाल उठते रहे कि आखिर राहुल गांधी कहां है। सोशलमीडिया में कुछ तस्वीरें उत्तराखंड की वायरल हुई थी। लेकिन बाद में इस पर यह कहकर विराम लगा दिया गया कि यह उनकी पुरानी तस्वीरें हैं। राहुल गांधी को कोई मामूली शख्सियत नहीं हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव होना भर भी उनकी उपलब्धि नही हैं। बल्कि वे देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी रही कांग्रेस के उत्तराधिकारी हैं। इसके साथ ही नेहरु गांधी परिवार के एकलौते राजनीतिक वारिश भी हैं। कांग्रेस के लिए राहुल गांधी की अहमियत क्या हैं। यह सवाल समय-समय पर उठता रहा है। लेकिन देश के विकास में कांग्रेस के साथ नेहरु और गांधी परिवार का बलिदान और योगदान नहीं भूलाया जा सकता है। राहुल युवा हैं उनकी सोच नयी है। देश की राजनीति में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। राहुल कांग्रेस और उसके भविष्य की राजनीति के चेहरा हैं। राहुल के अज्ञातवास को लेकर भारतीय मीडिया में काफी बाते हुईं। उन पर पलायनवादी होने का भी आरोप लगा।
अब उनकी वापसी भी उतने ही सवाल उठा रही है। पूरा विमर्श ही इस पर टिका है कि आखिर 56 दिन वाद दिल्ली लौट रहे राहुल गांधी की चिंतन झोली में नया क्या हैं। वापसी से क्या फायदा होने वाला है। उनका नया शोध और चिंतन का नया सिद्धांत क्या है। उससे देश, कांग्रेस और स्वंय राहुल गांधी को क्या फायदा होने वाला है। राहुल गांधी और उनकी राजनीतिक कुशलता का यह अज्ञातवास अग्नि परीक्षा होगी। हलांकि इस पर बहुत अधिक बखेड़़ा भी नहीं उठना चाहिए। क्योंकि सभी का अपना व्यक्तिगत जीवन होता है। हो सकता है उनका अज्ञातवास स्वयं की शांति और चिंतन के लिए हो, जिस कांग्रेस और राजनीति से जोड़़ा जा रहा है। यह बात तभी सामने आएगी। जब वे खुद मंच पर आएंगे। इस चिंतन की पहली अग्नि परीक्षा 19 अप्रैल को होने वाली किसान रैली है। कहा जा रहा है राहुल गांधी इस रैली को संबोधित करेंगे। अज्ञातवासवास के दौरान उन्हें व्यक्तिगत हमले भी झेलने पड़े। उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में पोस्टर लापता होने का पोस्टर भी चस्पा हुआ। संसद सत्र के ऐन मौके पर गायब होने पर भी सवाल उठाए गए।
राजनीति विरोधियों से और खुद कांग्रेस के अंदर घिरे राहुल गांधी नयी विचारधारा कितनी धारधार होगी इसका लोगों को बेसब्री से इंतजार है। कांग्रेस में राहुल की नेतृत्व की क्षमता को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं। पार्टी का युवा धड़ा राहुल और प्रियंका को सामने लना चाहता था। जबकि चाटुकार राजनीति के रणनीतिकार और सोनिया गांधी की परिक्रमा में लगा खेमा राहुल को बर्दाश्त नहीं करना चाहता है। क्योंकि पार्टी की कमान राहुल के हाथ में जाने से बुजुर्ग पीढ़ी के नेताओं का पत्ता साफ हो सकता हैं। युवा सोच का होने से कांग्रेस से मठाधीशों का सफाया करना चाहते हैं जबकि मां सोनिया गांधी ऐसा करने से उन्हें रोकती हैं। सोनिया ऐसे लोगों और अपने विश्वस्तों का हटाना नहीं चाहती हैं। जिन्होंने बुरे दिनों में उनका साथ दिया। जबकि यही बात बुजुर्गों को खलती है। यही कारण है कि पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाते हैं। उन्हें डर है कि अगर कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथ गयी तो कांगे्रस सेे बूढ़ों का पत्ता साफ हो जाएगा। राहुल गांधी सैद्धांतिक राजनीति करते हैं। जबकि सोनिया गांधी व्यवहारिक राजनीति करती हैं। सोनिया वफादारों को खाद-पानी देना चाहती हैं। जबकि राहुल गांधी का फैसला पार्टी के हित में अधिक स्वहित के लिए कम हैं। इसीलिए राहुल गांधी कांग्रेस को नए विचारों वाला दल बनाना चाहते हैं। संगठन में पुराने लोगों का पत्ता साफ करना चाहते हैं।
पार्टी में उच्चपदों पर जो लोग लंबे समय से आसीन हैं। उन्हें डर है कि राहुल गांधी के हाथ पार्टी की सत्ता गयी तो उनका बोरिया विस्तर सड़क पर होगा। दस जनपथ उनके लिए बेगाना होगा। अंदर की बात यह है कि मां-बेटे की आड़ में कांग्रेस में नेतृत्व क्षमता को लेकर जो बहस की जा रही है। वह तथ्यहीन है। पार्टी की सेहत सुधारने के बजाए लोगों को अपनी ंिचंता अधिक है। उन्हें लगता है कि भाजपा की तरह अगर कांग्रेस में भी यह प्रयोग दुहराया गया तो यहां भी बुजुर्ग पीढ़ी के नेता इतिहास में दफन हो जाएंगे। पार्टी में उनकी अहमियत नहीं रहेगी। यही कारण है कि राहुल गांधी पार्टी के कई आतंरिक निर्णयों से नाराज होकर अज्ञातवास को चले गए थे। राहुल का अज्ञातवास कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठता है कि राहुल गांधी देश छोड़कर कहा गए थे। उन्हें अज्ञातवास जाने की क्या जरुरत थी। वह चिंतन क्यों और किसके लिए था। राहुल गांधी खुद मां सोनिया के निर्णयों से खफा होकर वनवास का रास्ता अख्तियार किया था। या इस प्लानिंग में मां सोनिया, बहन प्रियंका और उनकी खुद सहमति थी। सोनिया गांधी क्या बेटे को विदेश भेजकर पार्टी में राहुल समर्थकों और विरोधियों का रुख भांपना चाहती थीं। सोनिया गांधी की सेहत पर कोई खास असर नहीं दिखा था। देश की मीडिया में इस विषय पर भले बड़े सवाल दागे गए थे। लेकिन मां सोनिया गांधी की तरफ से कोई बयान नहीं आया था।
भारतीय जनता पार्टी ने राहुल के गायब होने पर खूब हमला बोला। उन पर यह भी सवाल उठाए गए कि जिस समय संसद का अहम सत्र चल रहा हो उस दौरान उनका देश से बाहर जाना कई सवाल खड़े करता है। उस स्थिति में जब भूमि अधिग्रहण जैसे खास बिल पर संसद में चर्चा होनी थी और भाजपा नया संशोधित बिल ला रही थी। कांग्रेस राज में भूमि अधिग्रहण बिल लाने में राहुल गांधी की खास भूमिका थी। उन्हें किसानों के मसीहा के रुप देखा जाता है। वहीं दागियों को बचाने के लिए लाए जा रहे बिल पर भी उनकी भूमिका पर कई सवाल उठे थे। उन्हें आक्रामक राजनीति शैली का नेता बताया गया। लेकिन हमले चाहे जो किए गए। राजनीति में अपराधी करण को रोकने के लिए बिल फाड़कर उन्होंने जो कदम उठाया था। उनका वह कदम सौ फीसदी खरा था। लेकिन उनकी गैर मौजूदगी में सोनिया गांधी की नेतृत्व क्षमता कांग्रेस और देश के सामने सकारात्मक सोच लेकर आयी है।
भूमि बिल पर विपक्ष को एक एकजुट करने में उन्होंने खास भूमिका निभायी। इसके बाद कोयला घोटाले में सीबीआई की तरफ से नोटिस दिए जाने पर भी सोनिया गांधी यह जताने में कामयाब रही कि हम पूरी कांग्रेस आपके साथ खड़ी है। राहुल गांधी को अक्षम नहीं ठहराया जा सकता है। कांग्रेस की पराजय के लिए सिर्फ राहुल गांधी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। देश भर में कांग्रेस के पास कोई कैडर नहीं रह गया है। कांग्रेस के नेताओं का संपर्क जनता से टूट गया है। कांग्रेस की छबि केवल मीडिया मैन की रह गयी है। कांग्रेस का कैडर भाजपा, और दूसरे दलों में परिवर्तित हो चला है। राज्यों में स्थानीय मुद्दों पर आम आदमी के साथ आने वाला कोई नहीं दिखता है। दिल्ली और दस जनपथ से कांग्रेस आगे नहीं निकल पा रही है। कांग्रेस सिर्फ बस सिर्फ नेतृत्व मे ंउलझी है। कांग्रेस के रणनीतिकार अपनी सारी उर्जा पार्टी को संघर्षशील बनाने के बजाय कांग्रेस का नेतृत्व किसने के हाथ में हो इस सवाल पर उलझा है। जबकि असलीयत यह है कि कांग्रेस जब तक अपना जनाधारा नहीं बढ़ाती है कुछ होने वाला नहीं है। उसकी कमान राहुल गांधी संभाले या मां सोनिया कोई फायदा होने वाला नहीं है।
निश्चित तौर पर राहुल गांधी की वापसी सुखद है। राहुल भारतीय राजनीति के भविष्य हैं। उनके अंदर युवा सोच और नीति है। पार्टी की जय-पराजय मात्र से ही किसी को अक्षम नहीं ठहराया जा सकता है। लोकतंत्र मंे जनमत और संख्या बल महत्वपूर्ण होता है। कभी-कभी संख्या बल के बूते अहम फैसले और जमीनी हकीकत भी लहरों और अफवाहों के बीच दब जाती है। वैसा ही कुछ कांग्रेस के साथ हुआ। उसके लिए सिर्फ राहुल गांधी को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। राहुल अब स्वेदश लौट आएं हैं। कांग्रेस और देश के लिए अपने नये विजन और चिंतन का इस्तेमाल वे किस रुप में करते हैं। इसकी अपेक्षा पूरे देश को हैं। अब वक्त आ गया जब कांग्रेस और उसके संगठन को राहुल गांधी को गंभीरता से लेना चाहिए।