Wednesday, 18 June 2014

आज सौ साल बाद....

विनाश के सौ साल बाद
जिंदा हुईं तबाही की तस्वीरें

कहीं गोलियों की बौछार थी
कहीं सैनिकों की दहाड़ थी

कहीं दर्द बेहिसाब था
कहीं आंसुओं का सैलाब था

कहीं शहीदों की लाशें थीं
कहीं बिलखती विधवाएं थीं

कहीं जख्म बने नासूर थे
कहीं अनाथ होते मासूम थे

कहीं बारूद का बवंडर था
कहीं खौफ का मंजर था

आज सौ साल बाद....

कहीं युद्ध की कड़वी यादें हैं
कहीं मौतों के आंकड़े हैं

कहीं नुकसान की कहानी है
कहीं बोझिल आंखों में पानी है



कहीं शहादत पर फख्र है
कहीं इतिहास पर अफसोस है।

 प्रथम विश्व युद्ध को.. एक सदी पूरी हो चुकी है..इसकी शुरूआत 28 जून 1914 को यूरोप से हुई थी.... लेकिन विनाश के इस विश्वयुद्ध के ज़ख्म अभी तक जिंदा हैं... ये युद्ध किसी को हार तो किसी को जीत देकर गया...और साथ ही लाखों लोगों की यादें.. शहीदों की चिताएं... विकलांग, घायल, अनाथ बच्चे और बिलखती विधवाएं भी छोड़ गया। 1914 से लेकर 1918 तक.. चार साल तक चले इस युद्ध ने.. तबाही की ऐसी तस्वीर पेश की... जिसके आंकड़े देख कर किसी का भी दिल दहल उठे। इस युद्ध में इंसान की जान की तो जैसे कोई कीमत ही नहीं थी.. बस कीमत थी तो झूठे वर्चस्व की.....मौत बांटती सियासत की...और घिनौनी नीतियों की। आंकड़ों पर नज़र डालें को पता लगता है कि पहला विश्वयुद्ध विनाश का एक ऐसा संग्राम था... जो पानी की तरह दौलत को पीता रहा...और इंसानी जिंदगियों को निगल कर अपनी प्यास बुझाता रहा।

प्रथम विश्वयुद्ध के आंकड़े -
प्रथम विश्वयुद्ध में पहली बार 70 से ज्यादा देशों ने हिस्सा लिया।
इसमें लैटिन अमेरिका और उत्तरी यूरोप के 20 देशों ने हिस्सा नहीं लिया।
इस युद्ध में 13 लाख तोप के गोले दागे गए।
सैनिकों और अपनों की सलामती जानने के लिए 1000 करोड़ पत्र भेजे गए।
एक करोड़ लोगों के आशियाने उजाड़ दिए गए और वो शरणार्थी बन गए।
60 लाख सैनिक इस युद्ध में बंदी बनाए गए।

तबाही और विनाश के इस महायुद्ध में 10.75 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ...ये हिसाब सिर्फ आस्ट्रिया-हंगरी, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस और अमेरिका का है। सैनिकों की मौतों को लेकर भी ये महायुद्ध... बेहद विनाशकारी रहा। इस युद्ध में दुनिया भर से 7 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया।  और लगभग एक करोड़ सैनिकों की मौत हुईइस महायुद्ध में फ्रांस के 80 लाख सैनिकों ने हिस्सा लिया..जिनमें 14 लाख की मौत हो गई.. जबकि 42 लाख जवान घायल हो गए। जर्मनी में 1 करोड़ 30 लाख सैनिक युद्ध के मैदान में उतरे जिनमें 18 लाख की मौत हो गई...वहीं 42 लाख ज़ख्मी हो गए। ऑस्ट्रिया और हंगरी से 90 लाख सैनिकों ने युद्ध में हिस्सा लिया लेकिन 14 साल की मौत हो गई और 36 लाख घायल हो गए। ब्रिटेन और भारत ने भी 90 लाख सैनिकों को लड़ाई में शामिल किया...पर 9 लाख की मौत हुई और 20 लाख बुरी तरह ज़ख्मी हो गए। पहले विश्वयुद्ध में सबसे ज्यादा सेना रूस की तरफ से शामिल हुई... रूस के 1 करोड़ 80 लाख सैनिकों में से 18 लाख की मौत हो गई...वहीं घायलों की संख्या 50 लाख तक पहुंच गई। इटली से 60 लाख सैनिक युद्ध में उतरे...लेकिन 6 लाख को मौत नसीब हुई...जबकि 10 लाख घायल हो गए। और आखिरकार बात करें अमेरिका की...तो 40 लाख जवानों में से अमेरिका ने अपने आठ लाख जवानों को खो दिया..और 14 लाख घायल हो गए।

कहां कितनी मौतें
देश               कुल सैनिक        मौतें            घायल
फ्रांस              80 लाख           14 लाख        42 लाख 
जर्मनी            1.30 करोड़          18 लाख        42 लाख
ऑस्ट्रिया-हंगरी      90 लाख            14 लाख        36 लाख
ब्रिटेन -भारत       90 लाख            9 लाख         20 लाख
रूस               1.80 करोड़         18 लाख         50 लाख
इटली             60 लाख            6 लाख          10 लाख
अमेरिका           40 लाख            8 लाख         15 लाख

कुल मिला कर ये युद्ध 1 करोड़ जवानों की जान लील गया... जबकि 2 करोड से ज्यादा जवान घायल हुए। इस युद्ध में 30 लाख महिलाओं की मांग उजड़ी...तो 60 लाख बच्चे अनाथ हो गए। ये आंकड़े..100 साल पुरानी विनाश की उस कहानी को बयां करने के लिए काफी है...जिसे पहले विश्वयुद्ध का नाम दिया गया।

22 अगस्त 1914
विश्वयुद्ध का सबसे मनहूस दिन
यूं तो प्रथम विश्वयुद्ध चार साल तक चला...इन चार सालों में हर रोज़ हजारों लोग मौत का निवाला बने... लेकिन 22 अगस्त 1914 ...इस विश्वयुद्ध का सबसे काला दिन रहा... इस दिन सबसे ज्यादा विनाश हुआ... सबसे ज्यादा लोगों की जानें गईं... जी हां इस एक दिन में फ्रांस के 27 हजार सैनिकों की मौत हुई। विश्व युद्ध के दौरान कभी इतनी भारी संख्या में लोगों की मौत नहीं हुई।


विनाश का विश्वयुद्ध
किसने किया आगाज़ ?
भले ही पहले विश्व युद्ध को 100 साल पूरे हो चुके हैं.... लेकिन बुनियादी सवाल अभी भी उलझा हुआ है...और वो ये है कि आखिर प्रथम विश्व युद्ध किसने शुरू किया....दरअसल युद्ध खत्म होने के बाद 1919 में वरसाई की संधि में जर्मनी को युद्ध का असली जिम्मेदार ठहराया गया और इसके लिए बर्लिन पर बंदिशें लगाई गईं...लेकिन 1920 से ही माना जाने लगा कि इस युद्ध के लिए या तो सभी जिम्मेदार थे, या फिर कोई नहीं...क्योंकि जर्मनी के अलावा भी... 70 से ज्यादा देशों ने इस महायुद्ध में हिस्सा लिया। 
इतिहासकारों का मानना है कि जर्मनी के साथ-साथ ऑस्ट्रिया-हंगरी, रूस, सर्बिया, फ्रांस और ब्रिटेन भी इस युद्द के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। 2012 में आई एक किताब ने इस मुद्दे को फिर सुलगा दिया...कि पहले विश्व युद्ध में जर्मनी का कितना हाथ है.... ऑस्ट्रिलेयाई इतिहासकार क्रिस्टोफर क्लार्क की किताब द स्लीपवॉकर्स में दावा किया गया है कि जून 1914 में ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई राजकुमार की सारायेवो में हत्या किया जाना ही युद्ध की शुरुआत की इकलौती वजह नहीं थी... उनका कहना है कि ये बाल्कन युद्ध का नतीजा था, जो 1912 और 1913 में हुआ था... हालांकि उस युद्ध में ऑस्ट्रिया-हंगरी ने हिस्सा नहीं लिया था...
महायुद्ध में बिगड़े रिश्ते
आपसी संबंधों में पड़ी दरार
कहीं दोस्ती पर मर-मिटे लोग
कहीं दुश्मनी बनी मिसाल


1914 से 1918 के बीच यूरोप में हुआ प्रथम विश्व युद्ध... दो विरोधी सैन्य गठबंधनों के बीच लड़ा गया। एक तरफ अमेरिका, रूस और फ्रांस थे, तो दूसरी ओर जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी और इटली थे। हालांकि, युद्ध के दौरान एक-एक कर ओटोमन एम्पायर से लेकर बुल्गारिया और जापान तक तमाम देश इसमें शामिल हो गए।

इतिहास के इस बड़े युद्ध में 6 करोड़ यूरोपियन समेत 7 करोड़ सैन्यकर्मियों ने हिस्सा लिया था। इस युद्ध में 90 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई... बताया जाता है कि 28 जून 1914 को ऑस्ट्रिया के सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की हत्या इस युद्ध की वजह बनी। इसके ठीक एक महीने बाद ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। इस महायुद्ध में रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ने सर्बिया की मदद की। वहीं, जर्मनी ने ऑस्ट्रिया का साथ दिया। इसके बाद अन्य देश एक-एक कर जापान... ब्रिटेन की तरफ से...या तुर्की व जर्मनी की तरफ इस युद्ध का हिस्सा बन गए। शुरुआत में जीत जर्मनी की हुई, लेकिन 1917 में ही जर्मनी ने ब्रिटेन के  व्यापारी जहाजों को डुबो दिया। इससे खफा अमेरिका ब्रिटेन की तरफ से युद्ध के मैदान में उतर गया।

हालांकि, बोल्शेविक क्रांति की वजह से रूस को युद्ध से अलग होना पड़ा, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी और उसे सहयोगी राष्ट्रों को हरा दिया। आखिरकार, कुछ संधियों के बाद युद्ध की समाप्ति की घोषणा की गई। लेकिन चार साल तक चले इस युद्ध में.. भारी संख्या में जान और माल का नुकसान हुआ।

प्रथम विश्व युद्ध में
भारत की भूमिका

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने यूरोपीय, भूमध्यसागर के और मध्य पूर्व के युद्ध क्षेत्रों में अपने अनेक डिवीजनों और स्वतंत्र ब्रिगेडों का योगदान दिया था...उस वक्त भारतीय सेना को ब्रिटिश भारतीय सेना कहा जाता था। इस युद्ध में दस लाख भारतीय सैनिकों ने विदेशों में अपनी सेवाएं दीं...जिनमें से 62,000 सैनिक मारे गए और 67,000 घायल हो गए....युद्ध के दौरान कुल मिला कर 74,187 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी.

प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सेना ने जर्मनी पूर्वी अफ्रीका और पश्चिमी मोर्चे पर जर्मन साम्राज्य के खिलाफ युद्ध किया.
... इस युद्ध में खुदादाद खान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय बने....इस महायुद्द में जहां लाखों सैनिक विदेशों में लड़ाई लड़ रहे थे वहीं...देश की आंतरिक सुरक्षा और प्रशिक्षण कार्यों के लिए लाखों सैनिकों को भारत में ही रहना पड़ा था।
1919 में जब विश्व युद्ध खत्म हुआ तो भारतीय सेना अपने कुल 491,000 जवानों को ही वापिस बुला सकी...इनमें भी अनुभवी अधिकारियों की कमी थी, ज्यादातर अधिकारी युद्ध में मारे गए थे या बुरी तरह ज़ख्मी हो चुके थे। पहले विश्व युद्ध के खत्म होने के बावजूद भी भारतीय सेना के लिए संघर्ष  खत्म नहीं हुआ..1919 में भारतीय सेनाओं ने तीसरे अफगान युद्ध में हिस्सा लिया... इसके साथ ही 1920 से लेकर 1924 तक चले वजीरिस्तान अभियान में शामिल हुई... 1930 और 1931 के बीच अफरीदियों के खिलाफ भारतीय सैनिकों ने जंग छेड़ी तो 1933 में मोहमंदों के खिलाफ और फिर 1935 में दूसरे विश्व युद्ध से पहले एक बार फिर वजीरिस्तान में हुए युद्ध का हिस्सा बनी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीय सैनिकों के शहीद होने का ऐसा दौर छिड़ा...कि वो दूसरे विश्व युद्ध के खत्मे के बाद जाकर थमा। पहले विश्व युद्ध में भारत ने जहां बड़े-बड़े सूरमाओं को खोया..वहीं हथियारों और गोला बारूद में भारी आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ा।
अपने घर-परिवार को छोड़ कर...जिन सैनिकों ने इस विश्व युद्ध में हंसते-हंसते मौत को गले लगा लिया... उनकी याद में 1931 में दिल्ली में इंडिया गेट का निर्माण किया गया। इंडिया गेट देश की धरोहर होने के साथ-साथ प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए भारतीय सैनिकों के प्रति श्रद्धांजलि का प्रतीक भी है। 

विजय कुमार राय