Wednesday, 18 December 2013

भारतीय राजनीति में जातिवाद को बढ़ावा

भारतीय राजनीति में जातिवाद को बढ़ावा देने की शुरुआत भाजपा याने कि जनसंघ के जमाने से चली आ रही है। हिंदू और वह भी सिर्फ सवर्ण हिंदुओं की बात ही की जाती थी। हमारे गांव में एक सज्जन थे जिनके लिए कहा जाता था कि सारे संघ उनकी घर से पैदा हुए थे, मजाक तो यह भी चलती थी कि उनके घर बच्चा निक्कर पहनकर ही पैदा होता है।

जी हां, सवर्ण जाति के थे, भेदभाव उनकी रग-रग में समाया था। हमारे गांव के सबसे बड़े मंदिर के ट्रस्टी भी थे। एक बार बिजली का काम करने वाला गरीब मजूदर जो धाकड़ जाति का था, बल्ब ठीक करने के लिए उस मंदिर के गर्भ-गृह में प्रवेश कर गया। बस निक्कर में तूफान उठ खड़ा हुआ। अब धाकड़ शुद्र नहीं होते हैं, इस जाति के लोग सामान्यतया खेती करते हैं...। लेकिन सवर्ण तो सवर्ण उनके मंदिर में एक हिंदू गर्भ-गृह में चला गया? इन सज्जन ने उस गरीब का जीना मुश्किल कर दिया। उसके गरीब मां-बाप पैरों में गिर पड़े लेकिन टस से मस हो जाए तो फिर क्या कट्टरपंथी यूं ही बन जाते हैं? आप लोगों को आश्चर्य होगा कि मंदिर शुद्धि के लिए उस गरीब परिवार से ग्यारह हजार रुपये लिये गये जो कि उन्होंने अपना खेत बेचकर दिये?

हमारे गांव में भाजपा का सबसे ऊंचा झंड़ा इन्हीं सज्जन की हवेली पर लहराता है। पता नहीं कितनी बार हर छोटी-मोटी बात पर गांव को फसाद में फसा देना बड़ा आसान? किसी मुद्दे पर बाजार बंद करवाने निकले और मेरा भाई दुकान बंद कर ही रहा था, तब तक ये कट्टरपंथी आधमके और मेरे भाई के साथ छिना-झपटी कर दी, जब मेरे पिता को पता चला तो दुकान खोलकर बैठे और सभी निक्करों को ललकारा कि हिम्मत हो तो अब आओ?

हमारे यहां एक गरीब वर्ग है जो शाक-सब्जियां बेचकर रोजी-रोटी कमाते हैं। पता नहीं कितनी बार इन सब्जी बेचने वालों के खोमचे, टोकरे, झोपड़े जलाए गये होंगे। बचपन से सवर्ण जाति के इन कुछ लोगों द्वारा होता दमन देखता आया हूं, आज भी दुख होता है।

इंदिरा गांधी ने आपातकाल में शुद्रों को हिम्मत दी और उसका फर्क पड़ा। हमारे गांव के शुद्र भी बाजार में आने लगे, चाय की दुकान पर बैठकर चाय पीने लगे। कोई उन्हें कुछ कह नहीं सकता? जो कहने वाले थे वे सब तो अंदर थे और पुलिस का भय वह अलग। जब शुद्रों ने शादियों में अपने दुल्हे-दुल्हन को घोड़े पर निकालना शुरू किया तो बड़ा हंगामा हुआ, लेकिन कांग्रेस के भले नेताओं के सपोर्ट से सब कुछ ठीकठाक हो गया।

दूसरी जाति के प्रति इनकी नफरत तो जग-जाहिर है लेकिन अपने ही धर्म एक बहुत बड़े वर्ग को ये लोग आज भी अपने समान नहीं ला पाए? सदियों से शुद्रों ने जो दुख देखा है जब पढ़ने में आता है तो मन कांप उठता है...हारेमल जी आप वी.पी.सिंह और कांग्रेस को कोसते थकते नहीं, लेकिन मैंने अपनी आंखों से सवर्णों के ऐसे-ऐसे खेल देखे हैं कि भगवान का शुक्र मानता हूं कि भाजपा केंद्र में अपने दम पर कभी सरकार नहीं बना पाई और कभी बना भी नहीं पाएगी...कहते हैं उसकी लाठी में आवाज नहीं होती...।