Wednesday, 18 December 2013

ये अन्ना का सफर है ऐसे खत्म नहीं होगा

मुंबई के आजाद मैदान से चला अन्ना का ये आंदोलन आज एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गया है और अब एक बार फिर जनलोकपाल लाने के अभियान को अन्ना ने रालेगण सिद्धी गांव से शुरू किया है। जिस अन्ना की बदौलत अरविंद केजरीवाल की पार्टी का गठन हुआ, आज उन्हीं को किसी का साथ नहीं मिल रहा। अन्ना ने जनलोकपाल को लाने के लिए फिर से अनशन करने की ठानी है लेकिन बेहद अफसोस की बात है की अनशन के तीन दिन केजरीवाल और उनके साथियों को इस बात की याद आई है जो कभी हर कदम पर अन्ना के साथ नज़र आते थे। अनशन के पहले दिन की शुरूआत अन्ना ने अकेले ही की। शायद ‘आप’ के सदस्य इस नई राजनीति में बहुत व्यस्त है लेकिन आज जनता जिस पर भरोसा कर रही और चाह रही है कि आम आदमी पार्टी की ही सरकार बने उसे किसने बनाया? अरविंद केजरीवाल ने या ‘अन्ना हजारें’ ने? लोकपाल बिल लाने के लिए जन-आंदोलन करने वाले अन्ना हजारे की वजह से अरविंद केजरीवाल की पार्टी का जन्म हुआ है।
कौन है अन्ना हज़ारे
किसन बापट बाबूराव हज़ारे जिन्हें लोग ‘अन्ना हज़ारे’ के नाम से जानते है उनका जन्म 15 जून 1937 में हुआ। अन्ना हज़ारे एक भारतीय समाजसेवी है और समाज की भलाई के लिए उन्होंने हमेशा काम किया है। भारत सरकार ने 1992 में  उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था। सूचना के अधिकार के लिए काम करने वालों में अन्ना प्रमुख थे।
सबसे पहले अन्ना ने सूचना का अधिकार अधिनियम के समर्थन में मुंबई के आजाद मैदान से अपना अभियान शूरू किया। अन्ना 8 अगस्त 2003 को आजाद मैदान पर सूचना का अधिकार को लागू करने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए थे। ये अनशन 12 दिन तक चला और इस दौरान अन्ना और सूचना का अधिकार आंदोलन को पूरे देश का समर्थन मिला और फिर महाराष्ट्र सरकार को इस अधिनियम को पारित करना ही पड़ा। बस तब से अन्ना की आंधी चल पड़ी और एक मैदान से चला आंदोलन पूरे देश का राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। जिसके परिणामस्वरूप 12 अक्टूबर 2005 को भारतीय संसद ने भी सूचना का अधिकार के अधिनियम को पारित किया। अगस्त 2006 में अन्ना ने सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ अन्ना ने 11 दिन तक आमरण अनशन किया जिसे देशभर का समर्थन मिला, जिसके चलते सरकार ने संशोधन का इरादा बदल लिया। अन्ना हज़ारे ने कहा था की 2जी आवंटन घोटाला और सुरेश कलमाड़ी का राष्ट्रमंडल घोटाला सूचना के अधिकार कानून की वजह से ही सामने आ पाया, लेकिन इस कानून के पास दोषियों को जेल भेजने का अधिकार नहीं है। ये अधिकार और शक्ति जनलोकपाल विधेयक में है।
जन लोकपाल बिल
जिस जन लोकपाल विधेयक को लाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने 29 दिसम्बर की तारिख तय कर रखी है, उसको पारित करने के लिए अन्ना हज़ारे  5 अप्रैल 2011 को समाजसेवी अन्ना हज़ारे एवं उनके साथियों के जंतर-मंतर पर शुरू किए गए अनशन के साथ आरंभ हुआ। भारत की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी किरण बेदी, प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, मनीष सिसोदिया और इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में बने हुए अरविंद केजरीवाल इस अभियान में अन्ना के साथ थे। इस आंदोलन में पूरा देश अन्ना के साथ उमड़ पड़ा था लेकिन मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने इसके प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया और इसकी उपेक्षा की और अनशन के प्रति भी उनका रवैया उपेक्षा पूर्ण ही रहा। लेकिन ये आंदोलन इस तरह का नहीं था कि सरकार की इस उपेक्षा से खत्म हो जाता इसलिए भारत सरकार ने आनन-फानन में एक समिति बनाकर संभावित खतरे को टाला और 16 अगस्त तक संसद में लोकपाल विधेयक पारित कराने की बात स्वीकार कर ली। अगस्त से शुरु हुए मानसून सत्र में सरकार ने विधेयक लेकर आई वह कमजोर और जन लोकपाल के विपरीत था।
अन्ना हज़ारे ने इसके खिलाफ अपने पहले से तय तारीख को दोबारा 16 अगस्त को अनशन पर जाने की बात दोहराई। 16 अगस्त को सुबह साढ़े सात बजे जब वे अनशन पर जाने के लिए तैयारी कर रहे थे तब उन्हें दिल्ली पुलिस ने उनके ही घर से गिरफ्तार कर लिया। उनके टीम के अन्य लोग भी गिरफ्तार कर गए लिए। इस खबर ने आम जनता के दिल में हलचल मचा दी और वह सड़कों पर उतरकर सरकार के इस कदम का विरोध करने लगी। दिल्ली पुलिस ने अन्ना को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। अन्ना ने रिहा किए जाने पर दिल्ली से बाहर रालेगण सिद्धी गाँव चले जाने या 3 दिन तक अनशन करने की बात अस्वीकार कर दी। उन्हें 7 दिनों के न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। शाम तक देशव्यापी प्रदर्शनों की खबर ने सरकार को अपना कदम वापस खीचने पर मजबूर कर दिया।


दिल्ली पुलिस ने अन्ना को सशर्त रिहा करने का आदेश जारी किया। मगर अन्ना अनशन जारी रखने पर दृढ़ थे। बिना किसी शर्त के अनशन करने की अनुमति तक उन्होंने रिहा होने से इनकार कर दिया। 17 अगस्त तक देश में अन्ना के समर्थन में प्रदर्शन होता रहा। दिल्ली में तिहाड़ जेल के बाहर हजारों लोग डेरा डाले रहे। 17 अगस्त की शाम तक दिल्ली पुलिस रामलीला मैदान में और 7 दिनों तक अनशन करने की इजाजत देने को तैयार हुई। मगर अन्ना ने 30 दिनों से कम अनशन करने की अनुमति लेने से मना कर दिया। उन्होंने जेल में ही अपना अनशन जारी रखा। अन्ना को रामलीला मैदान में 15 दिन कि अनुमति मिली। अपने अनशन को समाप्त करने के लिए अन्ना ने सार्वजनिक तौर पर तीन शर्तों का ऐलान किया। उनका कहना था कि तमाम सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाया जाए, सरकारी कार्यालयों में एक नागरिक चार्टर लगाया जाए और सभी राज्यों में लोकायुक्त हो।
74 वर्षीय हजारे ने कहा कि अगर जन लोकपाल विधेयक पर संसद चर्चा करती है और इन तीन शर्तों पर सदन के भीतर सहमति बन जाती है तो वह अपना अनशन समाप्त कर देंगे।
आम आदमी पार्टी का गठन 
जनलोकपाल बिल के लिए शुरू हुआ अनशन इन शर्तों के साथ उस समय तो खत्म हो गया लेकिन फिर आई ‘आप’ पार्टी। ये पार्टी आम आदमी के लिए बनी और उसके मुखिया बने अरविंद केजरीवाल। अन्ना का हर कदम पर साथ देने वाले केजरीवाल ने 2012 में आम आदमी पार्टी की स्थापना की। पार्टी ने औपचारिक रूप से 26 नवंबर 2012 को नई दिल्ली में शुरूआत की। उसके बाद तो ‘आप’ ने हर तरफ अपनी पहचान बनाई और लोगों के दिलों पर और खासकर युवाओं के दिलों पर पूरी तरह से छा गई। केजरीवाल ने अपना चुनाव चिन्ह ‘झाड़ू’ इस इरादे के साथ रखा की भष्ट्राचार और महंगाई की सफाई कर देंगे।
2013 के विधानसभा चुनावों में ‘आप’ ने पहली बार चुनाव लड़ा। इस दौरान फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर ‘आप’ ने ही अपना कब्ज़ा कर रखा था और विधानसभा के चुनावों के बाद तो जैसे आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पर ही कब्ज़ा कर लिया है, केजरीवाल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को नई दिल्ली विधानसभा से बहुत करारी हार दी। विधानसभा की 70 सीटों में से 28 सीटों पर आप ने जीत हासिल की जो एक नई पार्टी के लिए बहुत बड़ी बात है। हालांकि ये अभी भी तय नहीं है की दिल्ली में सरकार किसकी बनेगी पर बीजेपी और कांग्रेस की राह में अब सबसे बड़ा रोड़ा बनकर उभरी है आम आदमी पार्टी।
अन्ना ने की थी शूरूआत
आज अरविंद केजरीवाल या पूरी आम आदमी पार्टी ने मिल कर पूरी दिल्ली में अपना परचम लहरा दिया हो लेकिन इसको बनाने की प्रेरणा देने वाले तो किसन बापट बाबूराव हज़ारे ही है।