Thursday, 19 December 2013

सेक्स सर्वे 2013: मेरी देह, मेरा हक्क


नजर तेरी बुरी और परदा मैं करूं? मेरी स्कर्ट से ऊंची मेरी आवाज है। जवान लड़कियों को अकसर सलाह दी जाती है कि यौन उत्पीडऩ से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि बदन दिखाऊ कपड़े न पहनें. जुलाई में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की ओर से हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों को दिए गए एक नोटिस में कहा गया था कि ‘‘सलीकेदार कपड़े’’ पहनें जैसे, सलवार-कमीज और दुपट्टा, वरना उन्हें 500 रु. जुर्माना देना होगा.

या फिर महिलाओं को नसीहत मिलती है कि वे रात 8 बजे के बाद घर से न निकलें-यह बात शीला दीक्षित ने तब कही थी जब पिछले साल 16 दिसंबर की घटना पर दिल्ली की जनता गुस्से में थी.

जाहिर है, यौन हिंसा से बचने के लिए यह कोई हल नहीं. इंडिया टुडे ग्रुप-एमडीआरए के 2013 के सेक्स सर्वे से पता चलता है कि शहरी भारत के पुरुषों की पुरुषवादी सोच उनके डीएनए में ही है. 36 फीसदी शहरी भारतीय पुरुषों का मानना है कि बलात्कार के लिए महिलाओं के बदन दिखाऊ कपड़े जिम्मेदार हैं; 33 फीसदी इसके लिए विकृत मानसिकता को दोषी ठहराते हैं.

 इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कम कपड़ों को यौन हिंसा की वजह मानने की थ्योरी शिक्षा के स्तर के साथ बढ़ती जाती है, यानी बदन दिखाऊ कपड़ों को यौन हिंसा की वजह मानने वालों में शिक्षित लोगों की संख्या ज्यादा है. इस तरह के 35 फीसदी उत्तरदाता हाइस्कूल तक पढ़े थे जबकि पोस्ट ग्रेजुएट उत्तरदाताओं की संख्या 45 फीसदी थी.

पीड़िता को ही जिम्मेदार बताने वालों में सभी वर्ग के लोग शामिल थे-चाहे वह पांच सितारा होटल की पार्टियों में जाने वाला वर्ग हो, कॉलेज के कैंपस हों या बसों में सफर करने वाला वर्ग. इस तरह की बातें घरों के भीतर और बाहर हर जगह सुनने को मिलीं.

16 दिसंबर के आंदोलन के दौरान हाथ से लिखा एक नारा थाः हमसे मत कहो कि बलात्कार न कराएं. पुरुषों से कहो कि हमारा बलात्कार न करें.

आखिर वह क्या बात है जो पुरुषों को औरतों की थोड़ी-सी ड्रेस ऊपर सरकने या स्तन की झलक मिलते ही, उनकी सोचने-समझने की शक्ति खत्म कर देती है और उन्हें कमजोर बना डालती है? शायद इसकी वजह यही हो सकती है कि पॉपुलर कल्चर में हर चीज इस तरह से रची गई है जिससे पुरुष प्यार के नाम पर किसी भी हद से गुजरने का खुद का अधिकार समझे.

इस साल की हिट फिल्म रांझणा को ही लें, जिसमें एक लड़की को परेशान करने की बात को दीवानगी दिखाकर पेश किया गया है, भले ही लड़की को उस लड़के में कोई दिलचस्पी न हो. लड़का उसका पीछा करता है, जबरन हाथ पकड़ लेता है, लड़की के लिए अपने हाथ की कलाई काट लेता है, सिर्फ इसलिए कि उसने अपना दिल उस लड़की को दे रखा है.

(जैसा कि उसका दोस्त उससे कहता है, ‘‘तुम्हारा प्यार न हो गया, यूपीएससी का एग्जाम हो गया. दस साल से पास ही नहीं हो रहा. लगता है, जैसे दस साल से यूपीएससी की परीक्षा दिए जा रहा है.’’) या फिर राऊडी राठौर को लें, जिसमें हीरो हीरोइन को मेरा माल कहता है और इशारों में बताता है कि लड़की की स्पेशल टैलेंट तो उसकी कमर में है.

प्रेम प्रसंग के कुछ मामलों में दीवानगी हिंसा का रूप अख्तियार कर लेती है. फिल्म दबंग का मशहूर डायलॉग इसे बड़ी अच्छी तरह दिखाता हैः थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब, प्यार से लगता है. हिंदी फिल्मों में हीरोइनों के साथ उग्रता दिखाने वाले इस तरह के हीरो अब विलेन नहीं माने जाते हैं.

बल्कि वे दबंग हीरो माने जाते हैं, जैसा फिल्म इशकजादे में उभरते ऐक्टर अर्जुन कपूर को हीरो के रूप में दिखाया गया है. वह एक मुस्लिम लड़की को धोखा देकर उससे शारीरिक संबंध बना लेता है. प्रेम अपनी सीमा लांघकर कब हिंसा का रूप ले लेता है? हनी सिंह के गानों और मर्दानगी, पर नायकों के बेलगाम संवादों (फिल्म गोलियों की रासलीला राम-लीला) ने इस सीमा को पूरी तरह से मिटा डाला है.

सच्चाई बहुत ही कड़वी है. सेक्स सर्वे से पता चलता है कि विवाह होने पर पुरुष पत्नी के साथ सेक्स को अपना अधिकार मानने लगता हैः सर्वे में शामिल 79 फीसदी पुरुषों ने माना कि सेक्स उनका वैवाहिक अधिकार है.

तहलका की घटना के बाद कुछ पुरुषवादियों की शिकायत है कि बेडरूम का अपराधीकरण हो रहा है. यह वह समय है जब उन्हें समझ आ रहा है कि बेडरूम में जो होता है, वह अब बेडरूम तक सीमित नहीं है.